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अपरीक्षिताभ्युपगमात्तद्विशेषपरीक्षणमभ्युपगमसिद्धान्तः 1/1/31


संधि विच्छेद:

  • अपरीक्षित + अभ्युपगमात् + तत् + विशेष + परीक्षणम् + अभ्युपगम + सिद्धान्तः।

पदच्छेद और अर्थ:

  1. अपरीक्षित:
    • अप (नहीं) + परीक्षित (जांचा हुआ) = जो जांचा नहीं गया।
    • अर्थ: बिना जांचे-परखे।
  2. अभ्युपगमात्:
    • अभ्युपगम (स्वीकार) + आत् (पंचमी विभक्ति) = स्वीकार से।
    • अर्थ: किसी बात को स्वीकार करने से।
  3. तत्:
    • वह।
    • अर्थ: उसी का।
  4. विशेष:
    • विशेष रूप।
    • अर्थ: विशेषता।
  5. परीक्षणम्:
    • जांच।
    • अर्थ: परीक्षण करना।
  6. अभ्युपगम:
    • स्वीकृति।
    • अर्थ: किसी मत को मानना।
  7. सिद्धान्तः:
    • निर्णय।
    • अर्थ: स्थापित मत या निर्णय।

पूरा अर्थ:

जो बिना जांचे-परखे किसी मत को स्वीकार किया गया है, उस मत की विशेषता की परीक्षा करना अभ्युपगम सिद्धान्त है।


व्याख्या:

यह सूत्र न्याय दर्शन में तर्क और प्रमाण की परख की विधि को रेखांकित करता है।

  • न्याय दर्शन का यह सिद्धांत कहता है कि केवल किसी तथ्य या मत को मान लेने से संतोष नहीं करना चाहिए।
  • उसकी विशेषताओं की गहन जांच और विवेचना करना आवश्यक है।
  • इसका उद्देश्य सत्य की खोज करना और मिथ्या मतों को खारिज करना है।
  • यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक पद्धति के समान है, जिसमें किसी भी सिद्धांत को सत्यापित करने के लिए उसकी बार-बार जांच होती है।

उदाहरण:

यदि कोई यह कहे कि "अग्नि गर्म है," तो केवल इस बात को मानना पर्याप्त नहीं है।

  • विशेष परीक्षण: अग्नि गर्म क्यों है? इसका प्रमाण क्या है? क्या यह हर स्थिति में गर्म रहती है? इस प्रकार तर्क और प्रमाण से विशेष परीक्षण करना ही अभ्युपगम सिद्धान्त की प्रक्रिया है।

यह सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि विचार, मत और धारणाओं को तर्क और परीक्षण की कसौटी पर कसकर सत्य का निर्णय करें।