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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।11.34।।द्रोण आदि जिनजिन शूरवीरोंसे अर्जुनको आशङ्का थी ( जिनके कारण पराजय होनेका डर था ) उनउनका नाम लेकर भगवान् कहते हैं कि तू मुझसे मारे हुओंको मार इत्यादि। उनमेंसे द्रोण और भीष्मसे भय होनेका कारण प्रसिद्ध ही है क्योंकि द्रोण तो धनुर्वेदके आचार्य दिव्य अस्त्रोंसे युक्त और विशेषरूपसे अपने सर्वोत्तम गुरु हैं तथा भीष्म सबसे बड़े स्वेच्छामृत्यु और दिव्य अस्त्रोंसे सम्पन्न हैं जो कि परशुरामजीके साथ द्वन्द्व युद्ध करनेपर भी उनसे पराजित नहीं हुए। वैसा ही जयद्रथ भी है जिसका पिता इस उद्देश्यसे तप कर रहा है कि जो कोई मेरे पुत्रका शिर भूमिपर गिरावेगा? उसका भी शिर गिर जायगा। कर्ण भी ( बड़ा शूरवीर है ) क्योंकि वह इन्द्रद्वारा दी हुई अमोघ शक्ितसे युक्त है और कन्यासे जन्मा हुआ सूर्यका पुत्र है? इसलिये उसके नामका भी निर्देश किया गया है। ( अभिप्राय यह कि द्रोण? भीष्म? जयद्रथ और कर्ण? तथा अन्यान्य शूरवीर योद्धा ) जो कि मेरेद्वारा मारे हुए,हैं? उनको तू निमित्तमात्रसे मार? उनसे भय मत कर। युद्ध कर? तू संग्राममें दुर्योधनादि शत्रुओंको जीतेगा।