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तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः

1. सन्धि विच्छेद:

तन्त्र + अधिकरण + अभ्युपगम + संस्थितिः + सिद्धान्तः

2. अर्थ:

  • तन्त्र: प्रणाली, पद्धति, या एक दृष्टिकोण।
  • अधिकरण: विषय या प्रसंग।
  • अभ्युपगम: स्वीकृति, मान्यता या प्रस्ताव।
  • संस्थितिः: स्थायित्व, स्थापित रूप या संरचना।
  • सिद्धान्तः: सिद्ध हुआ मत या मान्यता।

अर्थ (संयुक्त रूप में):

किसी विषय (अधिकरण) के आधार पर एक दृष्टिकोण (तन्त्र) को स्वीकृत (अभ्युपगम) करते हुए स्थिर (संस्थितिः) रूप से स्थापित विचार (सिद्धान्त)।

3. व्याख्या:

यह सूत्र दर्शन और तर्कशास्त्र में सिद्धान्त की प्रकृति को समझाता है।

  • तन्त्र: किसी पद्धति या प्रणाली का सुझाव देता है।
  • अधिकरण: वह प्रसंग या विषय जिसमें तर्क किया जा रहा हो।
  • अभ्युपगम: वह स्वीकृति या प्रारंभिक प्रस्ताव जिससे तर्क आरंभ होता है।
  • संस्थितिः: इसका अर्थ है किसी दृष्टिकोण को ठोस और स्थायी बनाना।
  • सिद्धान्त: वह अंतिम निष्कर्ष जिसे सब स्वीकार करते हैं।

इस सूत्र का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि सिद्धान्त तक पहुँचने के लिए एक सुव्यवस्थित दृष्टिकोण, एक विशिष्ट प्रसंग, स्वीकृत प्रस्ताव और स्थायी आधार की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया दर्शन में विचारों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करती है।

4. उदाहरण:

  • तन्त्र: "न्याय दर्शन की प्रणाली"।
  • अधिकरण: "ज्ञान की परिभाषा"।
  • अभ्युपगम: "ज्ञान को प्रमाण माना जाए"।
  • संस्थितिः: "ज्ञान को अनुभूति, स्मृति और भ्रम से भिन्न ठहराना"।
  • सिद्धान्तः: "ज्ञान, यथार्थ को प्रकट करने वाली सत्तावस्था है।"

5. निष्कर्ष:

यह सूत्र यह स्पष्ट करता है कि किसी भी सिद्धान्त को स्थापित करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। प्रसंग और प्रणाली को ध्यान में रखकर प्रस्ताव को स्वीकार करना और उसे स्थायी रूप से स्थापित करना ही दर्शनशास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।