1/1/23
श्लोक:
समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः 1/1/23
संधि विच्छेद:
- समान + अनेक + धर्म + उपपत्तेः + विप्रतिपत्तेः + उपलब्धि + अनुपलब्धि + व्यवस्थातः + च + विशेष + अपेक्षः + विमर्शः + संशयः।
- समान: समान, एक जैसा।
- अनेक: कई, भिन्न।
- धर्म: गुण या लक्षण।
- उपपत्तेः: सिद्धि, उत्पन्न होने की संभावना।
- विप्रतिपत्तेः: मतभेद या विरोध।
- उपलब्धि: उपलब्धि या प्राप्ति।
- अनुपलब्धि: अनुपस्थिति या प्राप्त न होना।
- व्यवस्थातः: व्यवस्था या क्रम।
- च: और।
- विशेष: भिन्नता, अंतर।
- अपेक्षः: आवश्यकता।
- विमर्शः: विचार, विवेचना।
- संशयः: संदेह या शंका।
अर्थ:
यह श्लोक संशय (संदेह) की प्रकृति और उसके कारणों का वर्णन करता है:
- समानानेकधर्मोपपत्तेः: जब समान वस्तु में कई गुण या लक्षण संभावित हों।
- विप्रतिपत्तेः: मतभेद या विरोध के कारण।
- उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातः: प्राप्ति और अनुपलब्धि की स्थिति की व्यवस्था के कारण।
- विशेषापेक्षः: किसी विशेष या भिन्नता की आवश्यकता।
- विमर्शः संशयः: ऐसे मामलों में विचार या विवेचना की आवश्यकता, जिसे संशय कहते हैं।
अर्थात, जब समान वस्तु में विभिन्न लक्षण या गुण संभावित होते हैं, मतभेद उत्पन्न होते हैं, और प्राप्ति-अनुपलब्धि की स्थिति अस्पष्ट होती है, तब किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए विचार और भिन्नता की आवश्यकता होती है। इसे संशय कहते हैं।
व्याख्या:
- संशय का स्वरूप:
- संशय तब उत्पन्न होता है जब किसी वस्तु, तथ्य, या स्थिति के बारे में विरोधाभासी या अस्पष्ट जानकारी होती है।
- यह जानकारी समान गुणों के कारण भ्रम पैदा करती है।
- दार्शनिक दृष्टि से:
- संशय को ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
- यह विचार-विमर्श (विमर्श) को प्रेरित करता है, जो अंततः ज्ञान तक पहुँचने का मार्ग बनता है।
- न्याय दर्शन में:
- न्याय दर्शन संशय को तर्क और प्रमाण के माध्यम से दूर करने पर बल देता है।
- यह बताता है कि किसी भी विषय पर निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त करने से पहले संशय को स्पष्ट करना आवश्यक है।
- उदाहरण:
- समान धर्म: किसी वस्तु का रंग सफेद है, लेकिन वह चाँदी है या सीप—यह समान गुणों (रंग) के कारण संशय उत्पन्न करता है।
- अनेक धर्म: एक ही समय में किसी व्यक्ति का व्यवहार दयालु और कठोर प्रतीत हो, तो संशय उत्पन्न होता है।
- उपलब्धि और अनुपलब्धि:
- यदि किसी घटना के कुछ प्रमाण उपलब्ध हों और कुछ अनुपलब्ध हों, तो संशय की स्थिति उत्पन्न होती है।
निष्कर्ष:
समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः यह बताता है कि संशय की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब समान वस्तु में विभिन्न लक्षण संभावित हों, मतभेद हो, या उपलब्धि-अनुपलब्धि अस्पष्ट हो। इसे दूर करने के लिए विशेष ध्यान और विवेचना की आवश्यकता होती है। संशय, सही ज्ञान प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण है।