1/1/22

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तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः 1/1/22


संधि विच्छेद:

  1. तत् + अति + अन्त + विमोक्षः + अपवर्गः
    • तत्: वह (यहाँ दुःख का संकेत है)।
    • अत्यन्त: पूर्ण रूप से, संपूर्ण रूप से।
    • विमोक्षः: मुक्ति, छूटना।
    • अपवर्गः: मोक्ष, अंतिम उद्देश्य।

संधि में विमोक्षः + अपवर्गः का स्वरूप विमोक्षोऽपवर्गः है।


अर्थ:

यह श्लोक कहता है:

तदत्यन्तविमोक्षः: दुःख से पूर्ण रूप से मुक्ति।

अपवर्गः: यही मोक्ष या जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

अर्थात, दुःख से संपूर्ण मुक्ति ही अपवर्ग (मोक्ष) है।


व्याख्या:

  1. दार्शनिक दृष्टि से:
    • यह श्लोक मोक्ष के स्वरूप को समझाता है।
    • दुःख, संसार के बंधन, और अविद्या से संपूर्ण रूप से मुक्त होने की अवस्था को अपवर्ग कहा जाता है।
    • यह आत्मा की स्वतंत्रता और परम शांति की स्थिति है।
  2. न्याय दर्शन में:
    • अपवर्ग न्याय दर्शन का अंतिम लक्ष्य है।
    • यह संसार के कर्मबंधन और त्रिविध दुःखों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) से मुक्ति है।
  3. आध्यात्मिक दृष्टि से:
    • आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप को पहचानकर जब संसार के मोह, आसक्ति, और कर्ता-भाव से मुक्त हो जाती है, तो वह अपवर्ग प्राप्त करती है।
    • यह अवस्था शांति और आनंद का प्रतीक है।
  4. व्यावहारिक दृष्टि से:
    • जीवन में दुःख और बाधाओं से मुक्ति पाकर व्यक्ति सुख और संतोष का अनुभव करता है।
    • अपवर्ग का विचार जीवन को नैतिक और संतुलित बनाने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण और संदर्भ:

  1. श्रीमद्भगवद्गीता:
    • गीता में कर्म और ज्ञान के माध्यम से मोक्ष (अपवर्ग) प्राप्ति का उल्लेख मिलता है।
  2. उपनिषदों का दृष्टिकोण:
    • आत्मा की शाश्वत शांति और ब्रह्म के साथ एकत्व की अवस्था को मोक्ष कहा गया है।

निष्कर्ष:

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः श्लोक यह सिखाता है कि जीवन का अंतिम उद्देश्य दुःख से संपूर्ण मुक्ति प्राप्त करना है। यह विचार व्यक्ति को आत्म-ज्ञान, नैतिकता, और आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित करता है, जिससे वह मोक्ष की अवस्था तक पहुँच सके।