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प्रवर्तनालक्षणा दोषाः 1/1/18
संधि विच्छेद:
- प्रवर्तना + लक्षणा + दोषाः
- प्रवर्तना: क्रिया, कार्य या गतिविधि।
- लक्षणा: विशेषता, चिह्न या स्वभाव।
- दोषाः: त्रुटियाँ, खामियाँ या बाधाएँ।
अर्थ:
यह श्लोक बताता है कि दोष (त्रुटि) की पहचान या लक्षण उस कार्य या प्रवृत्ति (प्रवर्तना) के माध्यम से होती है।
अर्थात, कार्य या गतिविधियों में उत्पन्न होने वाली त्रुटियाँ उनकी विशेषताओं से जानी जा सकती हैं।
व्याख्या:
- दार्शनिक दृष्टि से:
- दोष वह है जो किसी क्रिया को अशुद्ध, अनुपयुक्त, या अनैतिक बनाता है।
- दोषों की पहचान उनके प्रवर्तन (क्रियाओं) और उनके प्रभाव से की जाती है।
- कार्य की प्रकृति (लक्षणा) दोष का स्वरूप प्रकट करती है।
- व्यावहारिक दृष्टि से:
- हर कार्य में दोष हो सकते हैं, लेकिन उन्हें पहचानने के लिए उनके लक्षणों को समझना आवश्यक है।
- उदाहरण:
- यदि किसी कार्य में आलस्य (प्रवर्तन) है, तो यह असफलता का दोष बन सकता है।
- झूठ बोलने की प्रवृत्ति नैतिक दोष का लक्षण है।
- आध्यात्मिक दृष्टि से:
- दोषों को पहचानकर उनका परित्याग करना आध्यात्मिक प्रगति का हिस्सा है।
- मन, वाणी, और शरीर के दोषों का निवारण योग और ध्यान के माध्यम से किया जा सकता है।
- तार्किक दृष्टि से:
- दोषों की पहचान और उन्हें सुधारना कार्य की प्रभावशीलता बढ़ाने में सहायक है।
- दोष न केवल बाहरी कार्यों में होते हैं, बल्कि आंतरिक विचारों और भावनाओं में भी हो सकते हैं।
उदाहरण:
- दोषों के प्रकार:
- ज्ञान संबंधी दोष: अज्ञान, भ्रम।
- क्रिया संबंधी दोष: आलस्य, असावधानी।
- व्यवहार संबंधी दोष: झूठ, हिंसा।
- लक्षणों से पहचान:
- यदि परिणाम अनुचित या नकारात्मक है, तो यह दोष का संकेत है।
- कार्य में यदि संगति और नैतिकता का अभाव हो, तो यह दोषपूर्ण है।
निष्कर्ष:
प्रवर्तनालक्षणा दोषाः श्लोक यह सिखाता है कि दोष (त्रुटि) की पहचान उनकी गतिविधियों (प्रवर्तना) और विशेषताओं (लक्षणा) से की जा सकती है। यह दोषों को समझने और उन्हें सुधारने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति और समाज के कार्य अधिक शुद्ध और प्रभावी हो सकते हैं।