Sbg 10.32 htshg

From IKS BHU
Revision as of 13:16, 4 December 2025 by imported>Vij (Added {content_identifier} content)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।10.32।।हे अर्जुन सृष्टियोंका आदि? अन्त और मध्य अर्थात् उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय मैं हूँ। आरम्भमें तो भगवान्ने अपनेको केवल चेतनाधिष्ठित प्राणियोंका ही आदि? मध्य और अन्त बतलाया है? परन्तु यहाँ समस्त जगत्मात्रका आदि? मध्य और अन्त बतलाते हैं? यह विशेषता है। समस्त विद्याओंमें जो कि मोक्ष देनेवाली होनेके कारण प्रधान है? वह अध्यात्मविद्या मैं हूँ। शंकासमाधान करनेके समय बोले जानेवाले वाक्योंमें जो अर्थनिर्णयका हेतु होनेसे प्रधान है वह वाद नामक वाक्य मैं हूँ। यहाँ प्रवदताम् इस पदसे वक्ताद्वारा बोले जानेवाले वाद? जल्प और वितण्डा -- इन तीन प्रकारके वचनभेदोंका ही ग्रहण है ( बोलनेवालोंका नहीं )।