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प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीराम्भः 1/1/17
संधि विच्छेद:
- प्रवृत्तिः + वाक् + बुद्धि + शरीर + आम्भः
- प्रवृत्तिः: गतिविधि, कार्य करने की प्रवृत्ति।
- वाक्: वाणी।
- बुद्धि: विवेक या निर्णय लेने की शक्ति।
- शरीर: देह, भौतिक शरीर।
- आम्भः: जल या आचरण।
अर्थ:
यह श्लोक मनुष्य की प्रवृत्तियों (गतिविधियों) के विभिन्न स्तरों को दर्शाता है:
- वाक्: वाणी से होने वाली गतिविधियाँ।
- बुद्धि: विचार और निर्णय से संबंधित प्रवृत्तियाँ।
- शरीर: शारीरिक या क्रियात्मक गतिविधियाँ।
- आम्भः: जल (शुद्धि) के रूप में आचरण या प्रवृत्ति।
अर्थात, मनुष्य की प्रवृत्ति वाणी, बुद्धि, शरीर, और जल (शुद्ध आचरण) से संचालित होती है।
व्याख्या:
- वाणी (वाक्):
- वाणी मनुष्य की आंतरिक सोच और बाह्य अभिव्यक्ति का माध्यम है।
- वाणी के माध्यम से व्यक्ति अपने विचार और भावनाएँ प्रकट करता है।
- बुद्धि:
- बुद्धि व्यक्ति को सही-गलत का निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करती है।
- यह प्रवृत्ति तर्क और विवेक पर आधारित है।
- शरीर:
- शरीर क्रियात्मक प्रवृत्तियों का आधार है।
- शारीरिक कर्मों से व्यक्ति अपने विचारों और उद्देश्यों को साकार करता है।
- आम्भः (जल):
- जल यहाँ प्रतीकात्मक रूप में शुद्धता और जीवन का आधार है।
- यह व्यक्ति के आचरण और उसके पर्यावरण से जुड़ाव को दर्शाता है।
दार्शनिक दृष्टि से:
- यह श्लोक दर्शाता है कि मनुष्य की गतिविधियाँ चार स्तरों पर होती हैं—वाणी, विचार, शरीर, और शुद्ध आचरण।
- यह चारों प्रवृत्तियाँ मिलकर व्यक्ति के व्यक्तित्व और सामाजिक योगदान को परिभाषित करती हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से:
- वाणी को सत्य और मधुर बनाना, बुद्धि का सही दिशा में उपयोग करना, शरीर को संयमित रखना, और शुद्ध आचरण अपनाना आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं।
व्यावहारिक दृष्टि से:
- जीवन में सफलता के लिए इन चारों प्रवृत्तियों का संतुलन आवश्यक है।
- वाणी में संयम, बुद्धि में विवेक, शरीर में स्वास्थ्य, और आचरण में शुद्धता से व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा और संतोष प्राप्त कर सकता है।
निष्कर्ष:
प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीराम्भः श्लोक यह बताता है कि मनुष्य की प्रवृत्तियाँ वाणी, बुद्धि, शरीर, और शुद्ध आचरण से संचालित होती हैं। यह चारों प्रवृत्तियाँ मिलकर व्यक्ति के जीवन के भौतिक, मानसिक, और आध्यात्मिक पक्षों को संतुलित करती हैं।