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युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् 1/1/16
संधि विच्छेद:
- युगपत् + ज्ञान + अनुत्पत्तिः + मनसः + लिङ्गम्
- युगपत्: एक साथ, एक ही समय में।
- ज्ञान: अनुभव, बोध या जानकारी।
- अनुत्पत्तिः: उत्पन्न न होना।
- मनसः: मन का।
- लिङ्गम्: लक्षण, संकेत या प्रमाण।
अर्थ:
यह श्लोक मन के लक्षण या उसकी उपस्थिति को दर्शाता है:
- युगपत् ज्ञानानुत्पत्तिः: जब एक ही समय पर एक से अधिक ज्ञान उत्पन्न नहीं होते।
- मनसः लिङ्गम्: यह मन का लक्षण है।
अर्थात, मन का स्वभाव यह है कि यह एक ही समय पर केवल एक ज्ञान या अनुभव को उत्पन्न कर सकता है। यदि मन एक समय पर एक से अधिक ज्ञान उत्पन्न करने में असमर्थ है, तो यह उसकी सीमित प्रकृति और अस्तित्व का संकेत है।
व्याख्या:
- दार्शनिक दृष्टि से:
- भारतीय दर्शन में मन को ज्ञानेंद्रियों और आत्मा के बीच का माध्यम माना गया है।
- मन की यह विशेषता कि यह एक समय पर केवल एक ही ज्ञान उत्पन्न करता है, इसे अन्य अंगों से अलग करती है।
- उपलब्धि: यदि मन एक साथ कई चीजों पर ध्यान केंद्रित कर सके, तो यह अपनी प्रकृति के विपरीत होगा।
- व्यावहारिक दृष्टि से:
- मनुष्य एक समय में केवल एक ही विषय पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
- यदि कई विषय एक साथ सामने आते हैं, तो उनमें से केवल एक ही स्पष्ट रूप से अनुभव होता है।
- यह विशेषता मानसिक कार्यप्रणाली को व्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण बनाती है।
- आध्यात्मिक दृष्टि:
- योग और ध्यान में मन को एकाग्र करना महत्वपूर्ण माना गया है।
- मन का यह स्वभाव कि यह एक समय में केवल एक ज्ञान को ग्रहण करता है, ध्यान और समाधि में सहायक बनता है।
- तार्किक दृष्टि से:
- यदि मन एक समय में एक से अधिक ज्ञान उत्पन्न करता, तो व्यक्ति भ्रमित हो जाता।
- मन की यह विशेषता व्यक्तित्व के विकास और निर्णय लेने में मदद करती है।
निष्कर्ष:
यह श्लोक मन की स्वाभाविक प्रकृति और उसकी सीमाओं को दर्शाता है। मन का स्वभाव एकाग्रता और सीमितता से जुड़ा हुआ है, और यह एक समय में केवल एक ही ज्ञान को उत्पन्न कर सकता है। यह ज्ञान भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान दोनों में मन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।