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गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः 1/1/14
संधि विच्छेद:
- गन्ध + रस + रूप + स्पर्श + शब्दाः + पृथिव्यादि + गुणाः + तत् + अर्थाः
- गन्ध: गंध (सुगंध या दुर्गंध)।
- रस: स्वाद।
- रूप: आकार या दृश्य।
- स्पर्श: स्पर्श या छूने का अनुभव।
- शब्दाः: ध्वनि।
- पृथिव्यादि: पृथ्वी आदि (पंचमहाभूत)।
- गुणाः: विशेषताएँ।
- तत्: उनके।
- अर्थाः: उद्देश्य या उपयोग।
अर्थ:
यह श्लोक पंचमहाभूतों के गुणों को बताता है:
- गंध: पृथ्वी का गुण।
- रस: जल का गुण।
- रूप: अग्नि का गुण।
- स्पर्श: वायु का गुण।
- शब्द: आकाश का गुण।
इन गुणों का अनुभव करने के लिए पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (नाक, जीभ, आँख, त्वचा, और कान) कार्य करती हैं। ये गुण पंचमहाभूतों के लक्षण और उनके उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं।
व्याख्या:
- गुण और उनके भूत:
- पृथ्वी (गंध): स्थिरता और गंध प्रदान करती है।
- जल (रस): तरलता और स्वाद का कारण है।
- अग्नि (रूप): प्रकाश, रंग, और आकार को दर्शाती है।
- वायु (स्पर्श): गति और स्पर्श का आधार है।
- आकाश (शब्द): ध्वनि के प्रसार का माध्यम है।
- ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से अनुभव: पंचमहाभूतों के गुणों को अनुभव करने के लिए इंद्रियों का उपयोग होता है। उदाहरण:
- नाक से गंध।
- जीभ से स्वाद।
- आँख से रूप।
- त्वचा से स्पर्श।
- कान से ध्वनि।
- दार्शनिक दृष्टि: भारतीय दर्शन में पंचमहाभूत और उनके गुणों का वर्णन इस उद्देश्य से किया गया है कि व्यक्ति अपनी इंद्रियों और प्रकृति के बीच संबंध को समझ सके। यह आत्मा और प्रकृति के संतुलन का संकेत भी देता है।
- आध्यात्मिक और व्यावहारिक दृष्टि: पंचमहाभूतों के गुण जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को जोड़ते हैं। इनका संतुलन न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी आवश्यक है।
निष्कर्ष:
यह श्लोक पंचमहाभूतों के विशिष्ट गुणों और उनके उद्देश्य को स्पष्ट करता है। यह बताता है कि इन तत्त्वों और उनके गुणों का ज्ञान जीवन और प्रकृति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।