1/1/13

From IKS BHU
Revision as of 12:42, 26 December 2024 by imported>Gagan (Created page with "पृथ्व्यापस्तेजो वायुराकाशमिति भूतानि 1/1/13 ---- === संधि विच्छेद: === # '''पृथ्वी + आपः + तेजः + वायु + आकाशम् + इति + भूतानि''' #* '''पृथ्वी''': भूमि या धरती। #* '''आपः''': जल। #* '''तेजः''': अग्नि या प्रकाश। #* '''वायु''': ह...")
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

पृथ्व्यापस्तेजो वायुराकाशमिति भूतानि 1/1/13


संधि विच्छेद:

  1. पृथ्वी + आपः + तेजः + वायु + आकाशम् + इति + भूतानि
    • पृथ्वी: भूमि या धरती।
    • आपः: जल।
    • तेजः: अग्नि या प्रकाश।
    • वायु: हवा।
    • आकाशम्: आकाश।
    • इति: इस प्रकार।
    • भूतानि: तत्त्व या पंचमहाभूत।

अर्थ:

यह श्लोक पाँच महाभूतों का वर्णन करता है:

  1. पृथ्वी: स्थूलता और गंध का आधार।
  2. आपः (जल): तरलता और स्वाद का आधार।
  3. तेजः (अग्नि): उष्णता और दृष्टि का आधार।
  4. वायु: गति और स्पर्श का आधार।
  5. आकाशम्: शून्यता और ध्वनि का आधार।

इन पंचमहाभूतों से ही समस्त जगत की रचना हुई है।


व्याख्या:

  1. भौतिक दृष्टि से: पंचमहाभूत प्रकृति के आधारभूत तत्त्व हैं, जो हर वस्तु के निर्माण में सहायक होते हैं।
    • पृथ्वी स्थायित्व और घनत्व का प्रतीक है।
    • जल तरलता और प्रवाह का प्रतिनिधित्व करता है।
    • अग्नि ऊर्जा, गर्मी और परिवर्तन का आधार है।
    • वायु गति और जीवन का प्रतीक है।
    • आकाश वह माध्यम है जिसमें सब कुछ स्थित है।
  2. दार्शनिक दृष्टि से: भारतीय दर्शन के अनुसार, यह पाँच महाभूत प्रकृति और शरीर की संरचना के मूलभूत तत्त्व हैं।
    • पंचमहाभूतों के गुण (गंध, रस, रूप, स्पर्श, और ध्वनि) ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से अनुभव किए जाते हैं।
    • ये भौतिक और सूक्ष्म जगत के बीच संबंध स्थापित करते हैं।
  3. आध्यात्मिक दृष्टि से: इन पाँच तत्त्वों का संतुलन न केवल शरीर के लिए बल्कि पूरे ब्रह्मांड के लिए आवश्यक है। आयुर्वेद और योग में भी पंचमहाभूतों के संतुलन पर विशेष बल दिया गया है।

निष्कर्ष:

श्लोक यह बताता है कि संपूर्ण सृष्टि का आधार पंचमहाभूत हैं। ये न केवल भौतिक तत्त्व हैं बल्कि जीवन के गहरे दर्शन और प्रकृति के नियमों को समझने का माध्यम भी हैं।