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पृथ्व्यापस्तेजो वायुराकाशमिति भूतानि 1/1/13
संधि विच्छेद:
- पृथ्वी + आपः + तेजः + वायु + आकाशम् + इति + भूतानि
- पृथ्वी: भूमि या धरती।
- आपः: जल।
- तेजः: अग्नि या प्रकाश।
- वायु: हवा।
- आकाशम्: आकाश।
- इति: इस प्रकार।
- भूतानि: तत्त्व या पंचमहाभूत।
अर्थ:
यह श्लोक पाँच महाभूतों का वर्णन करता है:
- पृथ्वी: स्थूलता और गंध का आधार।
- आपः (जल): तरलता और स्वाद का आधार।
- तेजः (अग्नि): उष्णता और दृष्टि का आधार।
- वायु: गति और स्पर्श का आधार।
- आकाशम्: शून्यता और ध्वनि का आधार।
इन पंचमहाभूतों से ही समस्त जगत की रचना हुई है।
व्याख्या:
- भौतिक दृष्टि से: पंचमहाभूत प्रकृति के आधारभूत तत्त्व हैं, जो हर वस्तु के निर्माण में सहायक होते हैं।
- पृथ्वी स्थायित्व और घनत्व का प्रतीक है।
- जल तरलता और प्रवाह का प्रतिनिधित्व करता है।
- अग्नि ऊर्जा, गर्मी और परिवर्तन का आधार है।
- वायु गति और जीवन का प्रतीक है।
- आकाश वह माध्यम है जिसमें सब कुछ स्थित है।
- दार्शनिक दृष्टि से: भारतीय दर्शन के अनुसार, यह पाँच महाभूत प्रकृति और शरीर की संरचना के मूलभूत तत्त्व हैं।
- पंचमहाभूतों के गुण (गंध, रस, रूप, स्पर्श, और ध्वनि) ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से अनुभव किए जाते हैं।
- ये भौतिक और सूक्ष्म जगत के बीच संबंध स्थापित करते हैं।
- आध्यात्मिक दृष्टि से: इन पाँच तत्त्वों का संतुलन न केवल शरीर के लिए बल्कि पूरे ब्रह्मांड के लिए आवश्यक है। आयुर्वेद और योग में भी पंचमहाभूतों के संतुलन पर विशेष बल दिया गया है।
निष्कर्ष:
श्लोक यह बताता है कि संपूर्ण सृष्टि का आधार पंचमहाभूत हैं। ये न केवल भौतिक तत्त्व हैं बल्कि जीवन के गहरे दर्शन और प्रकृति के नियमों को समझने का माध्यम भी हैं।