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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।10.11।।आपकी प्राप्तिके कौनसे प्रतिबन्धके कारणका नाश करनेवाला बुद्धियोग आप उन भक्तोंको देते हैं और किसलिये देते हैं इस आकाङ्क्षापर कहते हैं --, उन ( मेरे भक्तों ) का किसी तरह भी कल्याण हो ऐसा अनुग्रह करनेके लिये ही मैं उनके आत्मभावमें स्थित हुआ अर्थात् आत्माका भाव जो अन्तःकरण है उसमें स्थित हुआ उनके अविवेकजन्य मिथ्या प्रतीतिरूप,मोहमय अन्धकारको प्रकाशमय विवेकबुद्धिरूप ज्ञानदीपकद्वारा नष्ट कर देता हूँ। अर्थात् जो भक्ितके प्रसादरूप घृतसे परिपूर्ण है और मेरे स्वरूपकी भावनाके अभिनिवेशरूप वायुकी सहायतासे प्रज्वलित हो रहा है? जिसमें ब्रह्मचर्य आदि साधनोंके संस्कारोंसे युक्त बुद्धिरूप बत्ती है? आसक्ितरहित अन्तःकरण जिसका आधार है? जो विषयोंसे हटे हुए और रागद्वेषरूप कालुष्यसे रहित हुए चित्तरूप वायुरहित अपवारकमें ( ढकनेमें ) स्थित है और जो निरन्तर अभ्यास किये हुए एकाग्रतारूप ध्यानजनित? पूर्ण ज्ञानस्वरूप प्रकाशसे युक्त है? उस ज्ञानदीपकद्वारा ( मैं उनके मोहका नाश कर देता हूँ )।