Sbg 10.5 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।10.5।।अहिंसा -- प्राणियोंको किसी प्रकार पीड़ा न पहुँचाना? समता -- चित्तका समभाव? संतोष -- जो कुछ मिले उसीको यथेष्ट समझना? तप -- इन्द्रियसंयमपूर्वक शरीरको सुखाना? दान -- अपनी शक्तिके अनुसार धनका विभाग करना ( दूसरोंको बाँटना )? यश -- धर्मके निमित्तसे होनेवाली कीर्ति? अपयश -- अधर्मके निमित्तसे होनेवाली अपकीर्ति। इस प्रकार जो प्राणियोंके अपने अपने कर्मोंके अनुसार होनेवाले बुद्धि आदि नाना प्रकारके भाव हैं? वे सब मुझ ईश्वरसे ही होते हैं।