Sbg 9.29 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।9.29।।( यदि कहो कि ) तब तो भगवान् रागद्वेषसे युक्त हैं क्योंकि वे भक्तोंपर ही अनुग्रह करते हैं दूसरोंपर नहीं करते? तो यह कहना ठीक नहीं है --, मैं सभी प्राणियोंके प्रति समान हूँ? मेरा न तो ( कोई ) द्वेष्य है और न ( कोई ) प्रिय है। मैं अग्निके समान हूँ। जैसे अग्नि अपनेसे दूर रहनेवाले प्राणियोंके शीतका निवारण नहीं करता? पास आनेवालोंका ही करता है? वैसे ही मैं भक्तोंपर अनुग्रह किया करता हूँ? दूसरों पर नहीं। जो ( भक्त ) मुझ ईश्वरका प्रेमपूर्वक भजन करते हैं? वे मुझमें स्वभावसे ही स्थित हैं? कुछ मेरी आसक्तिके कारण नहीं औरमैं भी स्वभावसेही उनमें स्थित हूँ? दूसरोंमें नहीं। परन्तु इतनेहीसे यह बात नहीं है कि मेरा उनमें ( दूसरोंमें ) द्वेष है।