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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।9.24।।उनका पूजन करना अविधिपूर्वक कैसे है सो कहते हैं कि --, श्रौत और स्मार्त समस्त यज्ञोंका देवतारूपसे मैं ही भोक्ता हूँ और मैं ही स्वामी हूँ। मैं ही सब यज्ञोंका स्वामी हूँ यह बात अधियज्ञोऽहमेवात्र इस श्लोकमें भी कही गयी है। परंतु वे अज्ञानी इस प्रकार यथार्थ तत्त्वसे मुझे नहीं जानते। अतः अविधिपूर्वक पूजन करके वे यज्ञके असली फलसे गिर जाते हैं अर्थात् उनका पतन हो जाता है।