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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।9.22।।परंतु जो निष्कामी -- पूर्ण ज्ञानी हैं --, जो संन्यासी अनन्यभावसे युक्त हुए अर्थात् परमदेव मुझ नारायणको आत्मरूपसे जानते हुए मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरी श्रेष्ठ -- निष्काम उपासना करते हैं? निरन्तर मुझमें ही स्थित उन परमार्थज्ञानियोंका योगक्षेम मैं चलाता हूँ। अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिका नाम योग है और प्राप्त वस्तुकी रक्षाका नाम क्षेम है? उनके ये दोनों काम मैं स्वयं किया करता हूँ। क्योंकि ज्ञानीको तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूँ और वह मेरा प्यारा है इसलिये वे उपर्युक्त भक्त मेरे आत्मारूप और प्रिय हैं। पू 0 -- अन्य भक्तोंका योगक्षेम भी तो भगवान् ही चलाते हैं उ 0 -- यह बात ठीक है? अवश्य भगवान् ही चलाते हैं किंतु उसमें यह भेद है कि जो दूसरे भक्त हैं वे स्वयं भी अपने लिये योगक्षेमसम्बन्धी चेष्टा करते हैं? पर अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योगक्षेमसम्बन्धी चेष्टा नहीं करते। क्योंकि वे जीने और मरनेमें भी अपनी वासना नहीं रखते? केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।