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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।9.16।।यदि भक्तलोग बहुत प्रकारसे उपासना करते हैं तो आपकी ही उपासना कैसे करते हैं इसपर कहते हैं --, क्रतु -- श्रौतयज्ञविशेष मैं हूँ और यज्ञस्मार्तकर्मविशेष भी मैं ही हूँ। तथा जो पितरोंको दिया जाता है? वह स्वधा नामक अन्न भी मैं ही हूँ। सब प्राणियोंसे जो खायी जाती है? उसका नाम औषध है? वह औषध भी मैं ही हूँ। अथवा यों समझो कि सब प्राणियोंका साधारण अन्न स्वधा है और व्याधिका नाश करनेके लिये काममें ली जानेवाली भेषज औषध है। तथा जिसके द्वारा देव और पितरोंको हवि पहुँचायी जाती है वह मन्त्र भी मैं ही हूँ। इसके अतिरिक्त मैं ही आज्य हविघृत हूँ? जिसमें होम किया जाता है वह अग्नि भी मैं ही हूँ और मैं ही हवनरूपकर्म भी हूँ।