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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।9.12।।क्योंकि --, वे मोघाशा -- जिनकी आशाएँ -- कामनाएँ व्यर्थ हों ऐसे व्यर्थ कामना करनेवाले और मोघकर्मा -- व्यर्थ कर्म करनेवाले होते हैं क्योंकि उनके द्वारा जो कुछ अग्निहोत्रादि कर्म किये जाते हैं वे सब अपने अन्तरात्मारूप भगवान्का अनादर करनेके कारण निष्फल हो जाते हैं। इसलिये वे मोघकर्मा होते हैं। इसके अतिरिक्त वे मोघज्ञानी -- निष्फल ज्ञानवाले होते हैं? अर्थात् उनका ज्ञान भी निष्फल ही होता है। और वे विचेता अर्थात् विवेकहीन भी होते हैं। तथा वे मोह उत्पन्न करनेवाली देहात्मवादिनी राक्षसी और आसुरी प्रकृतिका यानी राक्षसोंके और असुरोंके स्वभावका आश्रय करनेवाले हो जाते हैं। अभिप्राय यह कि तोड़ो? फोड़ो? पिओ? खाओ? दूसरोंका धन लूट लो इत्यादि वचन बोलनेवाले और बड़े क्रूरकर्मा हो जाते हैं। श्रुति भी कहती है कि वे असुरोंके रहने योग्य लोक प्रकाशहीन हैं इत्यादि।