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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।9.5।।मैं असंसर्गी हूँ? इसलिये --, ( वास्तवमें ) ब्रह्मादि सब प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं हैं? तू मेरे इस ईश्वरीय योग -- युक्ति -- घटनाको देख? अर्थात् मुझ ईश्वरके योगको यानी यथार्थ आत्मतत्त्वको समझ। संसर्गरहित आत्मा कहीं भी लिप्त नहीं होता यह श्रुति भी संसर्गरहित होनेके कारण ( आत्माकी ) निर्लेपता दिखलाती है। यह और भी आश्चर्य देख कि भूतभावन मेरा आत्मा संसर्गरहित होकर भी भूतोंका भरणपोषण करता रहता है परंतु भूतोमें स्थित नहीं है। क्योंकि परमात्माका भूतोंमें स्थित होना सम्भव नहीं? यह बात उपर्युक्त न्यायसे स्पष्ट दिखलायी जा चुकी है। पू 0 -- ( जब कि आत्मा अपनेसे कोई अन्य वस्तु ही नहीं है ) तो मेरा आत्मा यह कैसे कहा जाता है उ 0 -- लौकिक बुद्धिका अनुकरण करते हुए देहादि संघातको आत्मासे अलग करके फिर उसमें अहंकारका अध्यारोप करके मेरा आत्मा ऐसा कहते हैं? आत्मा अपने आपसे भिन्न है ऐसा समझकर लोगोंकी भाँति अज्ञानपूर्वक ऐसा नहीं कहते। जो भूतोंको प्रकट करता है -- उत्पन्न करता है या बढ़ाता है उसको भूतभावन कहते हैं।