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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।8.12।।यहाँ भी कविं पुराणमनुशासितारम् यदक्षरं वेदविदो वदन्ति इस प्रकार प्रतिपादन किये हुए परब्रह्मकी प्राप्तिका पूर्वोक्तरूपसे उपायभूत जो ओंकार है उसकी कालान्तरमें मुक्ितरूप फल देनेवाली वही उपासना योगधारणासहित कहनी है तथा उसके प्रसङ्ग और अनुप्रसङ्गमें आनेवाली बातें भी कहनी हैं। इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है --, समस्त द्वारोंका अर्थात् विषयोंकी उपलब्धिके द्वाररूप जो समस्त इन्द्रियगोलक हैं उन सबका संयम करके एवं मनको हृदयकमलमें निरुद्ध करके अर्थात् संकल्पविकल्पसे रहित करके फिर वशमें किये हुए मनके सहारेसे हृदयसे ऊपर जानेवाली नाडीद्वारा ऊपर चढ़कर अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापन करके योगधारणाको धारण करनेके लिये प्रवृत्त हुआ साधक ( परमगतिको प्राप्त होता है इस प्रकार अगले श्लोकसे सम्बन्ध है )।