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चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् 1/1/11

संधि विच्छेद:

चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्

👉 चेष्टा + इन्द्रिय + अर्थ + आश्रयः + शरीरम्


शब्दार्थ:

  1. चेष्टा: कर्म या गतिविधि, जो शरीर के माध्यम से की जाती है।
  2. इन्द्रिय: ज्ञानेंद्रियाँ (जैसे नेत्र, कान, नाक, जीभ, त्वचा) और कर्मेंद्रियाँ (हाथ, पैर आदि)।
  3. अर्थ: उद्देश्य या बाह्य विषय, जिनसे इंद्रियाँ संपर्क करती हैं।
  4. आश्रयः: आधार या निवास स्थान।
  5. शरीरम्: शरीर, जो आत्मा का भौतिक माध्यम है।

अर्थ:

यह सूत्र बताता है कि शरीर क्या है।

"शरीर वह है, जो चेष्टा (क्रियाएँ), इंद्रियों के कार्य, और बाहरी विषयों (अर्थ) का आश्रय (आधार) है।"


व्याख्या:

  1. शरीर की परिभाषा:
    • न्याय दर्शन के अनुसार, शरीर वह भौतिक माध्यम है, जिसके द्वारा आत्मा चेष्टा (क्रियाएँ) करती है और इंद्रियों के द्वारा बाहरी विषयों (जैसे ध्वनि, गंध, स्पर्श) को ग्रहण करती है।
    • शरीर इंद्रियों और उनके विषयों (अर्थों) का आधार है।
  2. चेष्टा और शरीर का संबंध:
    • चेष्टा का अर्थ है गति, कर्म, या प्रयास। यह केवल शरीर के माध्यम से संभव है, जैसे चलना, बोलना, या अन्य कार्य करना।
  3. इंद्रिय और शरीर का संबंध:
    • इंद्रियाँ, जो ज्ञान और कर्म के साधन हैं, शरीर पर निर्भर करती हैं।
    • शरीर वह आधार है, जिसमें इंद्रियों का निवास होता है और वे अपने कार्य करती हैं।
  4. अर्थ और इंद्रियों का संबंध:
    • "अर्थ" का मतलब बाहरी विषय (जैसे रंग, ध्वनि, गंध) है। इंद्रियाँ इन्हें अनुभव करने के लिए शरीर का उपयोग करती हैं।

दर्शन की दृष्टि से:

  1. आत्मा और शरीर का भेद: यह सूत्र स्पष्ट करता है कि शरीर केवल एक माध्यम (आश्रय) है, जबकि आत्मा इसकी क्रियाओं का कर्ता है।
  2. शरीर का उद्देश्य: शरीर का उद्देश्य आत्मा को उसके कर्मों और अनुभवों के लिए माध्यम प्रदान करना है।
  3. न्याय दर्शन में शरीर: न्याय दर्शन के अनुसार, शरीर के बिना आत्मा इंद्रियों और चेष्टाओं के माध्यम से बाहरी जगत का अनुभव नहीं कर सकती।

समकालीन परिप्रेक्ष्य:

यह सूत्र यह समझाने में सहायक है कि हमारा शरीर केवल एक साधन है, जिसके द्वारा हम कर्म, अनुभव, और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इसे आत्मा का स्थायी स्वरूप न मानकर, एक अस्थायी माध्यम के रूप में देखना चाहिए।