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चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् 1/1/11
संधि विच्छेद:
चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्
👉 चेष्टा + इन्द्रिय + अर्थ + आश्रयः + शरीरम्
शब्दार्थ:
- चेष्टा: कर्म या गतिविधि, जो शरीर के माध्यम से की जाती है।
- इन्द्रिय: ज्ञानेंद्रियाँ (जैसे नेत्र, कान, नाक, जीभ, त्वचा) और कर्मेंद्रियाँ (हाथ, पैर आदि)।
- अर्थ: उद्देश्य या बाह्य विषय, जिनसे इंद्रियाँ संपर्क करती हैं।
- आश्रयः: आधार या निवास स्थान।
- शरीरम्: शरीर, जो आत्मा का भौतिक माध्यम है।
अर्थ:
यह सूत्र बताता है कि शरीर क्या है।
"शरीर वह है, जो चेष्टा (क्रियाएँ), इंद्रियों के कार्य, और बाहरी विषयों (अर्थ) का आश्रय (आधार) है।"
व्याख्या:
- शरीर की परिभाषा:
- न्याय दर्शन के अनुसार, शरीर वह भौतिक माध्यम है, जिसके द्वारा आत्मा चेष्टा (क्रियाएँ) करती है और इंद्रियों के द्वारा बाहरी विषयों (जैसे ध्वनि, गंध, स्पर्श) को ग्रहण करती है।
- शरीर इंद्रियों और उनके विषयों (अर्थों) का आधार है।
- चेष्टा और शरीर का संबंध:
- चेष्टा का अर्थ है गति, कर्म, या प्रयास। यह केवल शरीर के माध्यम से संभव है, जैसे चलना, बोलना, या अन्य कार्य करना।
- इंद्रिय और शरीर का संबंध:
- इंद्रियाँ, जो ज्ञान और कर्म के साधन हैं, शरीर पर निर्भर करती हैं।
- शरीर वह आधार है, जिसमें इंद्रियों का निवास होता है और वे अपने कार्य करती हैं।
- अर्थ और इंद्रियों का संबंध:
- "अर्थ" का मतलब बाहरी विषय (जैसे रंग, ध्वनि, गंध) है। इंद्रियाँ इन्हें अनुभव करने के लिए शरीर का उपयोग करती हैं।
दर्शन की दृष्टि से:
- आत्मा और शरीर का भेद: यह सूत्र स्पष्ट करता है कि शरीर केवल एक माध्यम (आश्रय) है, जबकि आत्मा इसकी क्रियाओं का कर्ता है।
- शरीर का उद्देश्य: शरीर का उद्देश्य आत्मा को उसके कर्मों और अनुभवों के लिए माध्यम प्रदान करना है।
- न्याय दर्शन में शरीर: न्याय दर्शन के अनुसार, शरीर के बिना आत्मा इंद्रियों और चेष्टाओं के माध्यम से बाहरी जगत का अनुभव नहीं कर सकती।
समकालीन परिप्रेक्ष्य:
यह सूत्र यह समझाने में सहायक है कि हमारा शरीर केवल एक साधन है, जिसके द्वारा हम कर्म, अनुभव, और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इसे आत्मा का स्थायी स्वरूप न मानकर, एक अस्थायी माध्यम के रूप में देखना चाहिए।