1/1/10

From IKS BHU
Revision as of 15:55, 23 December 2024 by imported>Gagan (दसवीं व्याख्या)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम् 1/1/10

संधि विच्छेद:

👉 इच्छा + द्वेष + प्रयत्न + सुख + दुःख + ज्ञानानि + आत्मनः + लिङ्गम्


शब्दार्थ:

  1. इच्छा: कुछ पाने की चाह या अभिलाषा।
  2. द्वेष: किसी वस्तु, व्यक्ति, या परिस्थिति से घृणा या विरोध।
  3. प्रयत्न: प्रयास, मेहनत, या कर्म।
  4. सुख: आनंद या संतोष।
  5. दुःख: कष्ट, पीड़ा, या असंतोष।
  6. ज्ञानानि: ज्ञान (बोध, समझ), जो आत्मा के गुणों में से एक है।
  7. आत्मनः: आत्मा का (यहां आत्मा की विशेषताओं की चर्चा हो रही है)।
  8. लिङ्गम्: लक्षण, चिह्न, पहचान।

व्याख्या:

यह न्याय दर्शन का एक महत्वपूर्ण सूत्र है, जो आत्मा के अस्तित्व और उसके लक्षणों का वर्णन करता है।

  • इच्छा (Desire): आत्मा की वह प्रवृत्ति, जो किसी वस्तु की प्राप्ति की ओर प्रेरित करती है।
  • द्वेष (Aversion): आत्मा की वह प्रवृत्ति, जो किसी अप्रिय वस्तु या अनुभव से दूर रहने की इच्छा को दर्शाती है।
  • प्रयत्न (Effort): आत्मा की सक्रियता, जो इच्छाओं को पूरा करने या किसी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए होती है।
  • सुख (Pleasure): आत्मा के अनुभव का वह रूप, जो अनुकूल परिस्थितियों में होता है।
  • दुःख (Pain): आत्मा के अनुभव का वह रूप, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में होता है।
  • ज्ञान (Knowledge): आत्मा के बोध की क्षमता, जिसके माध्यम से वह वस्तुओं को समझता है।

इन सभी को आत्मा के लक्षण (लिङ्गम्) के रूप में प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि ये आत्मा की उपस्थिति और क्रियाशीलता को दर्शाते हैं।


दर्शन की दृष्टि से:

  1. आत्मा और शरीर का भेद: यह सूत्र स्पष्ट करता है कि आत्मा का अस्तित्व इच्छाओं, प्रयासों, सुख-दुःख, और ज्ञान में प्रकट होता है, जो शरीर और इंद्रियों के परे हैं।
  2. आत्मा के लक्षण: इन छह गुणों को आत्मा का स्वाभाविक लक्षण माना गया है।
  3. न्याय दर्शन का उद्देश्य: न्याय दर्शन का उद्देश्य आत्मा के स्वरूप का ज्ञान कराना है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो सके।

समकालीन उपयोग:

यह सूत्र यह समझने में मदद करता है कि मानव जीवन की अनुभूतियाँ (जैसे इच्छा, द्वेष) आत्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं। इन्हें समझने से हम अपने आंतरिक स्वरूप और जीवन के अर्थ को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।