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आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनः प्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् 1/1/9
संधि विच्छेद:
आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनः प्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु = आत्म + शरीर + इन्द्रिय + अर्थ + बुद्धि + मनः + प्रवृत्ति + दोष + प्रेत्यभाव + फल + दुःख + अपवर्ग + अस्तु
प्रमेयम् = प्रमेय + म्
न्याय दर्शन के 12 प्रमेयों का सारांश
| क्रमांक | प्रमेय | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | आत्मा | चेतन, अविनाशी तत्व जो जीवन का आधार है। |
| 2 | शरीर | आत्मा का भौतिक आवरण, जो कर्मों को संचालित करने का माध्यम है। |
| 3 | इन्द्रियाँ | ज्ञानेंद्रियाँ (चक्षु, श्रोत्र, त्वचा आदि), जिनसे बाहरी ज्ञान प्राप्त होता है। |
| 4 | अर्थ (विषय) | इन्द्रियों के विषय (रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द)। |
| 5 | बुद्धि | निर्णय करने और ज्ञान को समझने की शक्ति। |
| 6 | मन | इच्छाओं और विचारों का स्रोत; इन्द्रियों और बुद्धि के बीच सेतु। |
| 7 | प्रवृत्ति | शरीर और मन के द्वारा किए गए कर्म। |
| 8 | दोष | मानसिक विकार जैसे काम, क्रोध, लोभ, जो बंधन का कारण बनते हैं। |
| 9 | प्रेत्यभाव | मृत्यु के बाद आत्मा का पुनर्जन्म। |
| 10 | फल | कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त सुख या दुःख। |
| 11 | दुःख | जीवन में आने वाला कष्ट या पीड़ा। |
| 12 | अपवर्ग (मोक्ष) | जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, अंतिम लक्ष्य। |
विशेष:
यह तालिका न्याय दर्शन के अनुसार प्रमेयों का संक्षिप्त विवरण देती है, जो ज्ञान प्राप्ति और जीवन के उद्देश्य को समझने के लिए आवश्यक हैं।