1/1/9

From IKS BHU
Revision as of 17:36, 10 December 2024 by imported>Gagan (Created page with "आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनः प्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् 1/1/9 '''संधि विच्छेद:''' आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनः प्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्ग...")
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनः प्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् 1/1/9


संधि विच्छेद:

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनः प्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु = आत्म + शरीर + इन्द्रिय + अर्थ + बुद्धि + मनः + प्रवृत्ति + दोष + प्रेत्यभाव + फल + दुःख + अपवर्ग + अस्तु

प्रमेयम् = प्रमेय + म्


न्याय दर्शन के 12 प्रमेयों का सारांश

क्रमांक प्रमेय अर्थ
1 आत्मा चेतन, अविनाशी तत्व जो जीवन का आधार है।
2 शरीर आत्मा का भौतिक आवरण, जो कर्मों को संचालित करने का माध्यम है।
3 इन्द्रियाँ ज्ञानेंद्रियाँ (चक्षु, श्रोत्र, त्वचा आदि), जिनसे बाहरी ज्ञान प्राप्त होता है।
4 अर्थ (विषय) इन्द्रियों के विषय (रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द)।
5 बुद्धि निर्णय करने और ज्ञान को समझने की शक्ति।
6 मन इच्छाओं और विचारों का स्रोत; इन्द्रियों और बुद्धि के बीच सेतु।
7 प्रवृत्ति शरीर और मन के द्वारा किए गए कर्म।
8 दोष मानसिक विकार जैसे काम, क्रोध, लोभ, जो बंधन का कारण बनते हैं।
9 प्रेत्यभाव मृत्यु के बाद आत्मा का पुनर्जन्म।
10 फल कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त सुख या दुःख।
11 दुःख जीवन में आने वाला कष्ट या पीड़ा।
12 अपवर्ग (मोक्ष) जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, अंतिम लक्ष्य।

विशेष:

यह तालिका न्याय दर्शन के अनुसार प्रमेयों का संक्षिप्त विवरण देती है, जो ज्ञान प्राप्ति और जीवन के उद्देश्य को समझने के लिए आवश्यक हैं।