Sbg 7.18 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।7.18।।तो फिर क्या आर्त आदि तीन प्रकारके भक्त आप वासुदेवके प्रिय नहीं हैं यह बात नहीं तो क्या बात है
ये सभी भक्त उदार हैं श्रेष्ठ हैं। अर्थात् वे तीनों भी मेरे प्रिय ही हैं। क्योंकि मुझ वासुदेवको अपना कोई भी भक्त अप्रिय नहीं होता परंतु ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय होता है इतनी विशेषता है। ऐसा क्यों है सो कहते हैं ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है वह मुझसे अन्य नहीं है यह मेरा निश्चय है क्योंकि वह योगारूढ़ होनेके लिये प्रवृत्त हुआ ज्ञानी स्वयं मैं ही भगवान् वासुदेव हूँ दूसरा नहीं ऐसा युक्तात्मा समाहितचित्त होकर मुझ परम प्राप्तव्य गतिस्वरूप परब्रह्ममें ही आनेके लिये प्रवृत्त है।