Sbg 7.14 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।7.14।।तो फिर इस देवसम्बन्धिनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको मनुष्य कैसे तरते हैं इसपर कहते हैं क्योंकि यह उपर्युक्त दैवी माया अर्थात् मुझ व्यापक ईश्वरकी निज शक्ति मेरी त्रिगुणमयी माया दुस्तर हैअर्थात् जिससे पार होना बड़ा कठिन है ऐसी है। इसलिये जो सब धर्मोंको छोड़कर अपने ही आत्मा मुझ मायापति परमेश्वरकी ही सर्वात्मभावसे शरण ग्रहण कर लेते हैं वे सब भूतोंको मोहित करनेवाली इस मायासे तर जाते हैं वे इसके पार हो जाते हैं अर्थात् संसारबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।