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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।7.13।।ऐसा जो साक्षात् परमेश्वर नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव एवं सब भूतोंका आत्मा गुणोंसे अतीत और संसाररूप दोषके बीजको भस्म करनेवाला मैं हूँ उसको जगत् नहीं पहचानता इस प्रकार भगवान् खेद प्रकट करते हैं और जगत्का यह अज्ञान किस कारणसे है सो बतलाते हैं गुणोंमें विकाररूप सात्त्विक राजस और तामस इन तीनों भावोंसे अर्थात् उपर्युक्त राग द्वेष और मोह आदि पदार्थोंसे यह समस्त जगत् प्राणिसमूह मोहित हो रहा है अर्थात् विवेकशून्य कर दिया गया है अतः इन उपर्युक्त गुणोंसे अतीत विलक्षण अविनाशी विनाशरहित तथा जन्मादि सम्पूर्ण भावविकारोंसे रहित मुझ परमात्माको नहीं जान पाता।