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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।7.9।।पृथिवीमें मैं पवित्र गन्ध सुगन्ध हूँ अर्थात् उस सुगन्धरूप मुझ ईश्वरमें पृथिवी पिरोयी हुई है। जल आदिमें रस आदिकी पवित्रताका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ गन्धकी स्वाभाविक पवित्रता ही पृथिवीमें दिखलायी गयी है। गन्धरस आदिमें जो अपवित्रता आ जाती है वह तो सांसारिक पुरुषोंके अज्ञान और अधर्म आदिकी अपेक्षासे एवं भूतविशेषोंके संसर्गसे है ( वह स्वाभाविक नहीं है )। मैं अग्निमें प्रकाश हूँ तथा सब प्राणियोंमें जीवन हूँ अर्थात् जिससे सब प्राणी जीते हैं वह जीवन मैं हूँ और तपस्वियोंमें तप मैं हूँ अर्थात् उस तपरूप मुझ परमात्मामें ( सब ) तपस्वी पिरोये हुए हैं।