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इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानपव्यपदेश्यमव्यभिचारि  व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् 1/1/4


संधि विच्छेद:

इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं = इन्द्रिय + अर्थ + सन्निकर्ष + उत्पन्नं

ज्ञानम् = ज्ञान + म्

व्यपदेश्यमव्यभिचारि = व्यपदेश्यम् + अव्यभिचारि

व्यवसायात्मकम् = व्यवसाय + आत्मकम्

प्रत्यक्षम् = प्रत्यक्ष + म्


अर्थ:

  1. इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं: इन्द्रियों (चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, त्वक) और उनके विषयों (रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श) के प्रत्यक्ष संपर्क (सन्निकर्ष) से उत्पन्न ज्ञान।
    • इन्द्रिय: ज्ञानेन्द्रियाँ।
    • अर्थ: इन्द्रियों के विषय।
    • सन्निकर्ष: संपर्क।
    • उत्पन्नं: उत्पन्न हुआ।
  2. ज्ञानम्: यह ज्ञान (बोध) है, जो किसी वस्तु के बारे में सत्यता प्रकट करता है।
  3. व्यपदेश्यम्: वह जो किसी विशेष प्रकार से वर्णनीय या व्याख्यायनीय हो।
  4. अव्यभिचारि: ऐसा जो त्रुटिहीन हो और किसी अन्य तथ्य से विचलित न हो।
  5. व्यवसायात्मकम्: निर्णयात्मक या निश्चित बोध।
  6. प्रत्यक्षम्: प्रत्यक्ष ज्ञान, जो इन्द्रियों के माध्यम से सीधे अनुभव किया जाता है।

व्याख्या:

यह परिभाषा न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष ज्ञान (Perception) की परिभाषा है। इसे विस्तृत रूप में समझा जा सकता है:

  1. इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं: प्रत्यक्ष ज्ञान तब उत्पन्न होता है, जब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों के साथ सीधे संपर्क (सन्निकर्ष) में आती हैं। उदाहरण: आँखें रंग और रूप को देखती हैं।
  2. व्यपदेश्यम्: यह ऐसा ज्ञान है, जो स्पष्ट रूप से प्रकट किया जा सकता है और दूसरों को समझाया जा सकता है।
  3. अव्यभिचारि: यह ज्ञान यथार्थ और त्रुटिहीन होता है। उदाहरण: यदि आँखें एक नीले रंग की वस्तु को देखती हैं, तो यह ज्ञान सत्य होता है, जब तक कि भ्रम (जैसे मृगतृष्णा) न हो।
  4. व्यवसायात्मकम्: प्रत्यक्ष ज्ञान न केवल अनुभवजन्य होता है, बल्कि वह निश्चित और स्पष्ट रूप से बोधगम्य होता है।

निष्कर्ष:

प्रत्यक्ष वह ज्ञान है, जो इन्द्रियों के द्वारा उनके विषयों के संपर्क से उत्पन्न होता है, और वह निश्चित, यथार्थ, तथा व्याख्यायनीय होता है।