2/1/12
सूत्र
त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः 2/1/12
पदच्छेद
त्रैकाल्यासिद्धेः, प्रतिषेधानुपपत्तिः ।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | त्रैकाल्यासिद्धः | त्रिकाल सम्बन्ध के न होने के कारण |
| 2 | प्रतिषेधानुपपत्तिः |
सूत्रकार
क्योंकि पूर्वपक्षी प्रतिषेधरूप प्रमाण पूर्व में हो तो बिना निषेध के किसका निषेध किया जायगा । यदि प्रतिषेध पश्चात् माना जाय तो प्रतिषेध के न होने के कारण प्रतिषेध योग्य (प्रत्यक्षादिकों का अप्रमाण होना) न बन सकेगा। और यदि प्रतिषेधरूप प्रमाण तथा प्रतिषेध योग्य (प्रत्यक्षादिकों का प्रमाण न होना) दोनों एक काल में माने जांय तो प्रतिषेध योग्य (प्रत्यक्षादि प्रमाणों के मानने के कारण पूर्वपक्षी का निषेध करना व्यर्थ हो जायगा। इस प्रकार पूर्वपक्षी के 'प्रत्यक्षादि' प्रमाण नहीं हो सकने में 'काल की सिद्धि न होने के कारण' इस वाक्य की सिद्धि न होने के कारण प्रत्यक्षादि प्रमाण हैं यह सिद्ध हो जाता है।