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सूत्र
यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः 1/2/2
पदच्छेद
यथोक्तोपपन्नः, छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भः, जल्पः।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | यथोक्तोपपन्नः | वाद कथा के लक्षण में से युक्त |
| 2 | छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भः | छल, जाति तथा निग्रह स्थानों से स्वपक्ष की स्थापना तथा परपक्ष का खंडन |
| 3 | जल्पः | ऐसी कथा को जल्प कहते हैं |
सूत्रकार
वादकथा में कथित 'प्रमाणतर्कसाधनोपालंभः' इत्यादि विशेषण जिसमें हो तथा छठे, एवं पंचमाध्याय में कही जाने वाले छल, तथा निग्रह स्थानों से भी जिस कथा में स्वपक्ष की स्थापना एवं परपक्ष का खण्डन होता है उस कथा को जल्प कहते हैं।
इस सूत्र में 'यथोक्तोपपन्नः' इस विशेषण से संपूर्ण वादकथा का लक्षण लेना चाहिये, ऐसा यहाँ भाष्यकार का मत है किन्तु 'प्रमाणतर्कसाधनोपालंभः' यही विशेषण जल्प कथा में लेना चाहिए ऐसा वार्तिककार का मत है। जिससे 'सिद्धान्ताविरुद्धः' तथा 'पंचावयवोपपन्नः' के दो पद वादकथा में नियम देखाने के लिये ही है, जल्पकथा में तो किसी का नियम करना नहीं है ऐसी उपरोक्त भाष्यकार के मत पर वार्तिककार की अश्रद्धा है यह सूचित होता है
भाष्यकार
सूत्र के 'यथोक्तोपपन्नः' वाद कथा में कहे विशेषणों के अर्थ से युक्त , इस पद से प्रमाण और तर्क से जिसमें स्वपक्ष का स्थापन, तथा परपक्ष का खण्डन होता है, एवं माने हुए सिद्धान्त का विरोध न करने वाला, तथा प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों से युक्त पक्ष तथा प्रतिपक्ष का स्वीकार करना ( यह संपूर्ण वादकथा का लक्षण जल्प में भी होता है ) तथा सूत्र के 'छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालंभः' इस पद का अर्थ यह है कि जिस कथा में आगे कहे जाने वाले छल, तथा पंचम अध्याय में जिनका वर्णन होगा, ऐसे जाति ( असत् उत्तर ) एवं प्रतिज्ञाहानि आदि निग्रह स्थानों से जिसमें स्वपक्ष का साधन तथा परपक्ष का खण्डन भी किया जाता है ऐसे कथा को जल्प नामक द्वितीय कथा कहते हैं।
( उपरोक्त जल्पकथा के लक्षण में दोष दिखाते हुए भाष्यकार पूर्वपक्षिमत से शंका दिखाते हैं कि ) -छल, जाति तथा निग्रह स्थानों से किसी पक्ष का साधन ( स्थापना ), नहीं हो सकती, क्योंकि छलादि परपक्ष के खण्डन करते हैं, यह उनके सामान्य लक्षण तथा विशेष लक्षणों से सिद्ध होता है।
( दूसरा अर्थ करने ) से विघात ( दूषण देना ) इसे छल कहते हैं, तथा 'साधर्म्य वैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः' समानधर्म तथा विरुद्धधर्म से खण्डन करना जाति कहाती है, एव 'विप्रति- पत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्' विरुद्धज्ञान तथा अज्ञान ( न समझना ) निग्रहस्थान ( पराजय के स्थान ) होते हैं ( १-२-५, १-५९-६० ) इन छल, जाति तथा निग्रह स्थानों के सामान्य लक्षणों में छल, जाति, निग्रहस्थान से परपक्ष का खण्डन ही किया जाता है ऐसा प्रतीत होता है इसी प्रकार छलादिकों के विशेष लक्षणों में यथोचित ये परपक्ष का खण्डन ही करते हैं यह जानना चाहिये ।
और ऐसा नहीं है कि छलादिक परपक्ष का खण्डन करने से हो अपने पक्ष की स्थापना भी करते हैं क्योंकि कथा में छल, जाति तथा निग्रह स्थानों से परपक्ष का खण्डन करने बालो वाद कथा होती है, ऐसा कहने से ही यह जाना जा सकता है। (इस आशंका के समाधान में भाष्यकार कहते हैं कि) - स्वपक्ष का स्थापन तथा परपक्ष का खण्डन तो प्रमाणों से ही होता है जिसमें अपने पक्ष (मत) की रक्षा करने के कारण छलादिक अंग ( सहायक ) होते है। ये छलादिक स्वतन्त्र रूप से स्वपक्ष की स्थापना नहीं करते।
अर्थात् जो प्रमाणों से अपने पक्ष की स्थापना की जाती है, उसमें छल, जाति तथा निग्रह स्थान स्थापनापक्ष की रक्षा करने के कारण अंग (सहायक) होते हैं। क्योंकि छल, जाति तथा निग्रह स्थानों का प्रयोग करने से परपक्ष के खण्डन द्वारा छलादि के अपने पक्ष (स्थापनापक्ष) की रक्षा करते हैं। इसी कारण 'तत्वाध्यवसायरक्षणार्थं जल्पवितण्डे वीजप्ररोहसंरक्षणार्थ कण्टकश खावरणवत्' (४. २.५) वास्तविक पक्ष की रक्षा के लिये जल्प तथा वितण्डा दोनों कथायें होती है, जिस प्रकार बीज के अंकुरों की रक्षा के लिये क्षेत्र ( खेत ) के चारो तरफ कांटों के वृक्षों की शाखाओं से घेरा कर दिया जाता है,
ऐसा आगे सूत्रकार कहेगे। यह जो प्रमाणों से विरुद्ध पक्ष का खण्डन किया जाता है उसमें छलादिकों का प्रयोग होंने से ये विरुद्ध पक्ष के खण्डन करने से छलादि के सहायक होते हैं। इस प्रकार जल्पकथा में अंग ( गौण ) रूप से छलादिकों का ग्रहण होता है, स्वतन्त्र रूप से ये स्वपक्ष के साधक नहीं होते। किन्तु परपक्ष का खण्डन करने में छलादिक स्वतन्त्र भी होते हैं
भाषान्तर
Wrangling, which aims at gaining victory, is the defence or attack of a proposition in the manner aforesaid by quibbles, futilities, and other processes which deserve rebuke.
A wrangler is one who, engaged in a disputation, aims only at victory, being indifferent whether the arguments which he employs support his own contention or that of his opponent, provided that he can make out a pretext for bragging that he has taken an active part in the disputation.