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पूर्व पक्षी के कहे हुए त्रैकाल्यासिद्धि रूप इस हेतु की सिद्धि के लिए उदाहरण यदि पूर्व पक्षी दे तो  प्रत्यक्षादि अप्रमाण नहीं हो सकेंगे। और यदि प्रत्यक्षादि अप्रमाण हो तो लिया हुआ भी प्रत्यक्षरूप
पूर्व पक्षी के कहे हुए त्रैकाल्यासिद्धि रूप इस हेतु की सिद्धि के लिए उदाहरण यदि पूर्व पक्षी दे तो  प्रत्यक्षादि अप्रमाण नहीं हो सकेंगे। और यदि प्रत्यक्षादि अप्रमाण हो तो लिया हुआ भी प्रत्यक्षरूप उदाहरण निषेधरूप अर्थ को सिद्ध न कर सकेगा। इस प्रकार पूर्वपक्षी का अपने पक्ष की सिद्धि के लिये दिया हुआ त्रैकाल्यासिद्धिरूप हेतु प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरुद्ध होने के कारण विरुद्ध नामक हेत्वाभास (दुष्ट हेतु) हो जायगा यह सिद्धान्त सूत्र का आशय है।
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==== <big>'''भाष्यकार'''</big> ====
(१३वें सूत्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि)-(सम्पूर्ण प्रमाणों के निषेध से पूर्वपक्षी के मत में निषेध) (प्रश्न) कैसे नहीं बनेगा ? (उत्तर) - जिस कारण पूर्वपक्षी ने अपने पक्ष की सिद्धि के लिये जो '''<nowiki/>'त्रैकाल्यासिद्धि'<nowiki/>''' ऐसा हेतु दिया है उसका उदाहरण देता है तो उक्त हेतु के अर्थ का सिद्ध होना उसे दृष्टान्तर में दिखाना होगा (जो दृष्टान्त प्रत्यक्षप्रमाणरूप होता है)। और ऐसा होने से प्रत्यक्षादिक अप्रमाण न होंगे। और यदि वह प्रत्यक्षादिको को प्रमाण नहीं मानता तो अपना पक्षसिद्ध होने के लिये दिया हुआ भी उदाहरण (प्रत्यक्षप्रमाणरूप होने से 'प्रत्यक्षादिकों की अप्रमाणता' रूप अर्थ की सिद्धि न कर सकेगा। वह यह सम्पूर्ण प्रत्यक्षादि प्रमाणों के व्याहृत (विरोधयुक्त) होने के कारण '''<nowiki/>'त्रैकाल्यासिद्धि'<nowiki/>''' रूप पुर्वपक्षी का हेतु अहेतु (दुष्टहेतु) हो जायगा अर्थात् जो '''<nowiki/>'सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः' (१।२।६)''' इस सूत्र में हेत्वाभास के प्रकरण में कहा हुआ विरुद्ध नामक हेत्वाभास होने की आपत्ति आ जायगी। क्योंकि वाक्य का अर्थ ही सिद्धान्त है, और वह वाक्य का प्रकृत में अर्थ है '''<nowiki/>'प्रत्यक्षादिक प्रमाण अर्थ की सिद्धि नहीं करते'<nowiki/>''' (अर्थात् प्रमाण अर्थ की सिद्धि नहीं करते यह वाक्य पूर्वपक्षी का सिद्धान्तवाक्य है। इसी की सिद्धि के लिये पूर्वपक्षी ने प्रतिज्ञादि पांच वाक्यों का प्रयोग दिखाया है। जिनमें प्रत्येक वाक्य अपने-अपने अर्थ के बोधक होने के कारण प्रमाण होते हैं। इस प्रकार भी अवयव वाक्यों का अपना सिद्धान्त सिद्ध करने के लिये कथन करने पर भी उपरोक्त रीति से विरुद्ध नामक हेत्वाभास हो जाता है) (इसी आशय की भाष्यकार पुष्टि करते हुए आगे कहते हैं कि) - यह पूर्वपक्षी का प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों का  ग्रहण करना पूर्वपक्षो के सिद्धान्त की पुष्टि करने के लिए है। और यदि वह प्रतिज्ञादि अवयवों का ग्रहण नहीं करता तो दृष्टान्त में जिस '''<nowiki/>'त्रैकाल्यासिद्धि'<nowiki/>''' रूप हेतु का अर्थ नहीं दिखाया ऐसे इस हेतु से उसका 'प्रत्यक्षादिक प्रमाण नहीं होते' यह अर्थ सिद्ध नहीं होने के कारण प्रमाणसामान्य का निषेध भी नहीं बन सकता, क्योंकि '''<nowiki/>'त्रैकाल्यासिद्धि'<nowiki/>''' में हेतु का लक्षण ही नहीं आता। अर्थात् पूर्वपक्षी के '''<nowiki/>'त्रैकाल्यासिद्धि'''' रूप हेतु में उदाहरण के बल से सामर्थ्य न होने के कारण वह पूर्वपक्षी सम्पूर्ण प्रमाणों का खण्डन नहीं कर सकता
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Revision as of 13:04, 4 April 2025

सूत्र

सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः 2/1/13


पदच्छेद

सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च, प्रतिषेधानुपपत्तिः ।


पदपदार्थ

संख्या पद अर्थ
1 सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च और सम्पूर्ण प्रमाणों का निषेध करने से
2 प्रतिषेधानुपपत्तिः पूर्वपक्षी का निषेध नहीं हो सकता

सूत्रकार

पूर्व पक्षी के कहे हुए त्रैकाल्यासिद्धि रूप इस हेतु की सिद्धि के लिए उदाहरण यदि पूर्व पक्षी दे तो प्रत्यक्षादि अप्रमाण नहीं हो सकेंगे। और यदि प्रत्यक्षादि अप्रमाण हो तो लिया हुआ भी प्रत्यक्षरूप उदाहरण निषेधरूप अर्थ को सिद्ध न कर सकेगा। इस प्रकार पूर्वपक्षी का अपने पक्ष की सिद्धि के लिये दिया हुआ त्रैकाल्यासिद्धिरूप हेतु प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरुद्ध होने के कारण विरुद्ध नामक हेत्वाभास (दुष्ट हेतु) हो जायगा यह सिद्धान्त सूत्र का आशय है।


भाष्यकार

(१३वें सूत्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि)-(सम्पूर्ण प्रमाणों के निषेध से पूर्वपक्षी के मत में निषेध) (प्रश्न) कैसे नहीं बनेगा ? (उत्तर) - जिस कारण पूर्वपक्षी ने अपने पक्ष की सिद्धि के लिये जो 'त्रैकाल्यासिद्धि' ऐसा हेतु दिया है उसका उदाहरण देता है तो उक्त हेतु के अर्थ का सिद्ध होना उसे दृष्टान्तर में दिखाना होगा (जो दृष्टान्त प्रत्यक्षप्रमाणरूप होता है)। और ऐसा होने से प्रत्यक्षादिक अप्रमाण न होंगे। और यदि वह प्रत्यक्षादिको को प्रमाण नहीं मानता तो अपना पक्षसिद्ध होने के लिये दिया हुआ भी उदाहरण (प्रत्यक्षप्रमाणरूप होने से 'प्रत्यक्षादिकों की अप्रमाणता' रूप अर्थ की सिद्धि न कर सकेगा। वह यह सम्पूर्ण प्रत्यक्षादि प्रमाणों के व्याहृत (विरोधयुक्त) होने के कारण 'त्रैकाल्यासिद्धि' रूप पुर्वपक्षी का हेतु अहेतु (दुष्टहेतु) हो जायगा अर्थात् जो 'सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः' (१।२।६) इस सूत्र में हेत्वाभास के प्रकरण में कहा हुआ विरुद्ध नामक हेत्वाभास होने की आपत्ति आ जायगी। क्योंकि वाक्य का अर्थ ही सिद्धान्त है, और वह वाक्य का प्रकृत में अर्थ है 'प्रत्यक्षादिक प्रमाण अर्थ की सिद्धि नहीं करते' (अर्थात् प्रमाण अर्थ की सिद्धि नहीं करते यह वाक्य पूर्वपक्षी का सिद्धान्तवाक्य है। इसी की सिद्धि के लिये पूर्वपक्षी ने प्रतिज्ञादि पांच वाक्यों का प्रयोग दिखाया है। जिनमें प्रत्येक वाक्य अपने-अपने अर्थ के बोधक होने के कारण प्रमाण होते हैं। इस प्रकार भी अवयव वाक्यों का अपना सिद्धान्त सिद्ध करने के लिये कथन करने पर भी उपरोक्त रीति से विरुद्ध नामक हेत्वाभास हो जाता है) (इसी आशय की भाष्यकार पुष्टि करते हुए आगे कहते हैं कि) - यह पूर्वपक्षी का प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों का  ग्रहण करना पूर्वपक्षो के सिद्धान्त की पुष्टि करने के लिए है। और यदि वह प्रतिज्ञादि अवयवों का ग्रहण नहीं करता तो दृष्टान्त में जिस 'त्रैकाल्यासिद्धि' रूप हेतु का अर्थ नहीं दिखाया ऐसे इस हेतु से उसका 'प्रत्यक्षादिक प्रमाण नहीं होते' यह अर्थ सिद्ध नहीं होने के कारण प्रमाणसामान्य का निषेध भी नहीं बन सकता, क्योंकि 'त्रैकाल्यासिद्धि' में हेतु का लक्षण ही नहीं आता। अर्थात् पूर्वपक्षी के 'त्रैकाल्यासिद्धि' रूप हेतु में उदाहरण के बल से सामर्थ्य न होने के कारण वह पूर्वपक्षी सम्पूर्ण प्रमाणों का खण्डन नहीं कर सकता


भाषान्तर