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संशय के समान जिस जिस शास्त्र अथवा कथा में संदेहपूर्वक परीक्षा की जाये उसमें प्रतिवादी के संशय का निषेध करने पर समाधान करना चहिए इसी कारण सबसे प्रथम संशय की सूत्रकार ने परीक्षा की है। | संशय के समान जिस जिस शास्त्र अथवा कथा में संदेहपूर्वक परीक्षा की जाये उसमें प्रतिवादी के संशय का निषेध करने पर समाधान करना चहिए इसी कारण सबसे प्रथम संशय की सूत्रकार ने परीक्षा की है। | ||
( इस सूत्र को आगे दिखाए अनुसार भाष्यकार ने यथाश्रुत अर्थ का स्पष्टीकरण किया है किन्तु परिशुद्धिकार उदयनाचार्य ने जिस पदार्थ के विषय में संदेह हो उसी की परीक्षा करनी उपयुक्त है, प्रयोजनादि पदार्थों की उनसे किसी का संशय न ना होने के कारण परीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है अथवा ' | ( इस सूत्र को आगे दिखाए अनुसार भाष्यकार ने यथाश्रुत अर्थ का स्पष्टीकरण किया है किन्तु परिशुद्धिकार उदयनाचार्य ने जिस पदार्थ के विषय में संदेह हो उसी की परीक्षा करनी उपयुक्त है, प्रयोजनादि पदार्थों की उनसे किसी का संशय न ना होने के कारण परीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है अथवा ''''यत्र यत्र संशयः'''' इस समान युक्ति से प्रयोजनदिकों की भी परीक्षा हो सकती है, क्योंकि जहां कही संशय हो वहां उत्तर उत्तर प्रसंग करना, अर्थात आगे आगे प्रयोजनादि पदार्थों मे भी इसी प्रकार प्रसंग करना चहिए ऐसा सूत्र का भाव प्रकट करना चाहिए ) | ||
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==== '''<big>भाष्यकार</big>''' ==== | |||
( सूत्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार कहते हैं की )- जिस जिस स्थल में शास्त्र अथवा वदादि कथाओं मे संशय पूर्वक परीक्षा हो, उस उस स्थल में संशय का प्रतिवादी के निषेध करने पर समाधान कहना चाहिए । इसी कारण सम्पूर्ण परीक्षाओं में व्यापक होने के कारण ही संशय की प्रथम परीक्षा की है । | |||
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==== <big>'''भाषान्तर'''</big> ==== | |||
Latest revision as of 17:35, 28 March 2025
सूत्र
यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तरप्रसङ्गः 2/1/7
पदच्छेद
यत्र, संशयः, तत्र, उत्तरोत्तरप्रसङ्गः ।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | यत्र | जिसमें (जिस प्रमाणादि पदार्थों की परीक्षा में) |
| 2 | संशयः | संदेह |
| 3 | तत्र तत्र | उस-उस (परीक्षा में प्रतिवादी द्वारा संशय का निषेध करने पर) |
| 4 | उत्तरोत्तरप्रसङ्गः | समाधान करना है |
सूत्रकार
संशय के समान जिस जिस शास्त्र अथवा कथा में संदेहपूर्वक परीक्षा की जाये उसमें प्रतिवादी के संशय का निषेध करने पर समाधान करना चहिए इसी कारण सबसे प्रथम संशय की सूत्रकार ने परीक्षा की है।
( इस सूत्र को आगे दिखाए अनुसार भाष्यकार ने यथाश्रुत अर्थ का स्पष्टीकरण किया है किन्तु परिशुद्धिकार उदयनाचार्य ने जिस पदार्थ के विषय में संदेह हो उसी की परीक्षा करनी उपयुक्त है, प्रयोजनादि पदार्थों की उनसे किसी का संशय न ना होने के कारण परीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है अथवा 'यत्र यत्र संशयः' इस समान युक्ति से प्रयोजनदिकों की भी परीक्षा हो सकती है, क्योंकि जहां कही संशय हो वहां उत्तर उत्तर प्रसंग करना, अर्थात आगे आगे प्रयोजनादि पदार्थों मे भी इसी प्रकार प्रसंग करना चहिए ऐसा सूत्र का भाव प्रकट करना चाहिए )
भाष्यकार
( सूत्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार कहते हैं की )- जिस जिस स्थल में शास्त्र अथवा वदादि कथाओं मे संशय पूर्वक परीक्षा हो, उस उस स्थल में संशय का प्रतिवादी के निषेध करने पर समाधान कहना चाहिए । इसी कारण सम्पूर्ण परीक्षाओं में व्यापक होने के कारण ही संशय की प्रथम परीक्षा की है ।