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| === श्लोक: ===
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| '''स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात् 1/1/26'''
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| === संधि विच्छेद: ===
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| # '''स + चतुर्विधः + सर्व + तन्त्र + प्रतितन्त्र + अधि + करण + आभ्युपगम + संस्थिति + अर्थ + अन्तर + भावात्'''
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| #* '''स''': वह।
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| #* '''चतुर्विधः''': चार प्रकार का।
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| #* '''सर्व''': सर्व, सभी।
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| #* '''तन्त्र''': तंत्र, प्रणाली या साधन।
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| #* '''प्रतितन्त्र''': विपरीत तंत्र, विरोधी तंत्र।
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| #* '''अधि''': अधिकार, संबंधित।
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| #* '''करण''': कारण, साधन।
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| #* '''आभ्युपगम''': अभिप्रेत, प्रयोजन की ओर अग्रसर होना।
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| #* '''संस्थिति''': स्थिति, स्थिति की व्यवस्था।
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| #* '''अर्थ''': उद्देश्य, कारण।
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| #* '''अन्तर''': अंतर, भिन्नता।
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| #* '''भावात्''': कारण से, या किसी कारण के कारण।
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| === अर्थ: ===
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| यह श्लोक कहता है:
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| '''वह चार प्रकार का होता है, क्योंकि सभी तंत्रों और उनके विपरीत तंत्रों में संपर्क स्थापित करने की स्थिति विभिन्न उद्देश्य और कारणों के बीच अंतर के कारण होती है।'''
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| '''अर्थात''', किसी भी तंत्र (व्यवस्था) का कार्य और स्थिति तब समझी जा सकती है, जब हम उस तंत्र के संबंधित साधनों और उनके विपरीत साधनों के संपर्क की व्यवस्था को ध्यान में रखें।
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| === व्याख्या: ===
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| # '''चतुर्विध''':
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| #* इसका अर्थ है चार प्रकार का। यहाँ यह संकेत कर रहा है कि किसी विशेष प्रणाली (तंत्र) में चार प्रकार के तत्व या सिद्धांत हो सकते हैं।
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| #* यह तात्पर्य है कि किसी तंत्र के चार मुख्य घटक होते हैं जिनसे वह तंत्र संचालित होता है।
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| # '''सर्वतन्त्र''' और '''प्रतितन्त्र''':
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| #* '''सर्वतन्त्र''' का अर्थ है वह तंत्र जो मुख्य है या सामान्य रूप से स्वीकार्य है।
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| #* '''प्रतितन्त्र''' का अर्थ है वह तंत्र जो इसके विपरीत या विरोधी है।
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| #* यह किसी तंत्र के दोनों पक्षों या दृष्टिकोणों को दिखाता है, जिसमें एक पक्ष सामान्य होता है और दूसरा पक्ष विरोधाभासी या विपरीत होता है।
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| # '''आभ्युपगम संस्थिति''':
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| #* यह संकेत करता है कि किसी भी तंत्र का उद्देश्य और स्थिति तब ही समझी जा सकती है जब हम इसके अन्य पक्षों या विरोधी तंत्रों के संपर्क को समझें।
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| #* यह तात्पर्य है कि किसी तंत्र का कार्य तभी सही तरीके से कार्यान्वित होता है जब हम सभी संबंधित तंत्रों की स्थिति और स्थिति के विभिन्न पहलुओं को समझते हैं।
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| # '''अर्थान्तरभावात्''':
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| #* यहाँ पर '''अर्थान्तर''' से यह कहा जा रहा है कि तंत्रों का कार्य अलग-अलग उद्देश्यों और कारणों के आधार पर होता है, जो अंतर की स्थिति उत्पन्न करते हैं।
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| #* इसका मतलब यह है कि किसी तंत्र की कार्यप्रणाली और स्थिति में भिन्नता होती है, जो अलग-अलग परिस्थितियों और उद्देश्यों पर निर्भर करती है।
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| === उदाहरण: ===
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| # '''तंत्र और विपरीत तंत्र''':
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| #* जैसे किसी संगठन में कार्यप्रणाली (तंत्र) होती है, लेकिन उसके भीतर या बाहर कुछ विरोधी विचारधाराएँ (प्रतितन्त्र) भी हो सकती हैं, जो संगठन के उद्देश्यों को प्रभावित करती हैं।
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| #* इसी तरह से किसी वैज्ञानिक सिद्धांत को समझने के लिए उस सिद्धांत के साथ जुड़े और विरोधी तंत्रों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
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| # '''न्याय दर्शन में''':
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| #* न्याय दर्शन में तर्क (तन्त्र) और उसके विरोधी तर्क (प्रतितन्त्र) के बीच अंतर की स्थिति को समझना जरूरी है, ताकि एक सही निष्कर्ष तक पहुँच सकें।
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| === निष्कर्ष: ===
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| '''स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात्''' श्लोक यह सिखाता है कि किसी तंत्र (प्रणाली) के कार्य और स्थिति को समझने के लिए उसके विभिन्न घटकों, साधनों, और उनके विरोधी घटकों का संपर्क और उद्देश्य समझना आवश्यक है। यह विशेष रूप से किसी तंत्र की पूर्णता और कार्यप्रणाली को समझने में सहायक होता है।
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