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==== <big>'''पदच्छेद'''</big> ====
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युगपत्सिद्धौ, प्रत्यर्थनियतत्वात्, क्रमवृत्तित्वाभावो, बुद्धीनाम् ।
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==== <big>'''पदपदार्थ'''</big> ====
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!संख्या
!पद
!अर्थ
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|1
|'''युगपत्सिद्धौ'''
|प्रमाण तथा प्रमेय पदार्थ की एक ही काल में सत्ता मानने पर
|-
|2
|'''प्रत्यर्थनियतत्वात्'''
|प्रत्येक विषय में नियमित न होने के कारण
|-
|3
|'''क्रमवृत्तित्वाभावः'''
|क्रम से होने का अभाव हो जाएगा
|-
|4
|'''बुद्धीनाम्'''
|ज्ञान
|}
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==== <big>'''सूत्रकार'''</big> ====
यदि पूर्वकाल तथा पश्चात् काल में प्रमेय से प्रमाण की सत्ता मानने पर (उपरोक्त) दोष आने के कारण प्रमेय तथा प्रमाण दोनों की एक काल में सत्ता मानी जाय तो बुद्धियों (ज्ञानों) के प्रत्येक विषय में नियत होने के कारण, ज्ञान क्रम से होते हैं यह न बन सकेगा" (अर्थात् अनेक विषय के ज्ञान एक काल में होने लगेंगे अर्थात् एक काल में प्रमेय तथा प्रमाण विषयक ज्ञान होने से प्रत्यक्ष का विरोध होगा क्योंकि एक समय में एक ही विषय का ज्ञान होता है। तथा '''<nowiki/>'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्'''' एक काल में अनेक ज्ञान होना मन का साधक है, इस आशय का सिद्धान्ती में भी विरोध होगा ।
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==== <big>'''भाष्यकार'''</big> ====
(एकादश सूत्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार पूर्वपक्षी के मत से प्रमाण तथा प्रमेय दोनों एक काल में भी नहीं माने जा सकते, इस आशय से व्याख्या करते हैं कि)- "यदि प्रमाण तथा प्रमेय भी युगपद (एक काल में) होते हैं तो घ्राण आदि इन्द्रियों के विषय गन्ध आदिकों के प्रत्येक विषय के ज्ञान भी एक काल में हो सकेंगे इस कारण ज्ञानों के प्रत्येक अपने विषय में नियत होने के कारण ज्ञानों का क्रम से होना न हो सकेगा। अर्थात् जो यह बुद्धियाँ घ्राण आदि (ज्ञान) क्रम से अपने-अपने विषयों में होते हैं वह उन बुद्धियों (ज्ञानों) में क्रम से होना न हो सकेगा, इस कारण (एक काल में प्रमाण तथा प्रमेय को सत्ता नहीं मानी जा सकती।
तथा '''<nowiki/>'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्'( 1/1/16 )''' एक काल मे अनेक ज्ञान ना होना ही भीतरी मन रूप इंद्रिय का साधक है , इससे सिद्धांती के मन के लक्षण का विरोध होगा। प्रमाण का पूर्व, उत्तर तथा एक काल मे होना इतना ही प्रमाण तथा प्रमेय के सद्भाव (रहने) का विषय हो सकता है, जो पूर्व दर्शित पूर्वपक्षी के तीनों सूत्रों के अनुसार हो नहीं सकता। इस कारण प्रत्यक्ष आदि मे प्रमाणता (प्रमाण होने का) संभव नहीं हो सकता , अतः सिद्धांती का प्रथमाध्याय में वर्णन किया हुआ प्रत्यक्षादि चार प्रमाणों का प्रमाण होना असंभव है  इस प्रकार पूर्वपक्षी के आक्षेप का आशय है ।  
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==== '''भाषान्तर''' ====

Latest revision as of 14:02, 1 April 2025

सूत्र

युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात् क्रमवृत्तित्वाभावो बुद्धीनाम् 2/1/11


पदच्छेद

युगपत्सिद्धौ, प्रत्यर्थनियतत्वात्, क्रमवृत्तित्वाभावो, बुद्धीनाम् ।


पदपदार्थ

संख्या पद अर्थ
1 युगपत्सिद्धौ प्रमाण तथा प्रमेय पदार्थ की एक ही काल में सत्ता मानने पर
2 प्रत्यर्थनियतत्वात् प्रत्येक विषय में नियमित न होने के कारण
3 क्रमवृत्तित्वाभावः क्रम से होने का अभाव हो जाएगा
4 बुद्धीनाम् ज्ञान

सूत्रकार

यदि पूर्वकाल तथा पश्चात् काल में प्रमेय से प्रमाण की सत्ता मानने पर (उपरोक्त) दोष आने के कारण प्रमेय तथा प्रमाण दोनों की एक काल में सत्ता मानी जाय तो बुद्धियों (ज्ञानों) के प्रत्येक विषय में नियत होने के कारण, ज्ञान क्रम से होते हैं यह न बन सकेगा" (अर्थात् अनेक विषय के ज्ञान एक काल में होने लगेंगे अर्थात् एक काल में प्रमेय तथा प्रमाण विषयक ज्ञान होने से प्रत्यक्ष का विरोध होगा क्योंकि एक समय में एक ही विषय का ज्ञान होता है। तथा 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' एक काल में अनेक ज्ञान होना मन का साधक है, इस आशय का सिद्धान्ती में भी विरोध होगा ।


भाष्यकार

(एकादश सूत्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार पूर्वपक्षी के मत से प्रमाण तथा प्रमेय दोनों एक काल में भी नहीं माने जा सकते, इस आशय से व्याख्या करते हैं कि)- "यदि प्रमाण तथा प्रमेय भी युगपद (एक काल में) होते हैं तो घ्राण आदि इन्द्रियों के विषय गन्ध आदिकों के प्रत्येक विषय के ज्ञान भी एक काल में हो सकेंगे इस कारण ज्ञानों के प्रत्येक अपने विषय में नियत होने के कारण ज्ञानों का क्रम से होना न हो सकेगा। अर्थात् जो यह बुद्धियाँ घ्राण आदि (ज्ञान) क्रम से अपने-अपने विषयों में होते हैं वह उन बुद्धियों (ज्ञानों) में क्रम से होना न हो सकेगा, इस कारण (एक काल में प्रमाण तथा प्रमेय को सत्ता नहीं मानी जा सकती।

तथा 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्'( 1/1/16 ) एक काल मे अनेक ज्ञान ना होना ही भीतरी मन रूप इंद्रिय का साधक है , इससे सिद्धांती के मन के लक्षण का विरोध होगा। प्रमाण का पूर्व, उत्तर तथा एक काल मे होना इतना ही प्रमाण तथा प्रमेय के सद्भाव (रहने) का विषय हो सकता है, जो पूर्व दर्शित पूर्वपक्षी के तीनों सूत्रों के अनुसार हो नहीं सकता। इस कारण प्रत्यक्ष आदि मे प्रमाणता (प्रमाण होने का) संभव नहीं हो सकता , अतः सिद्धांती का प्रथमाध्याय में वर्णन किया हुआ प्रत्यक्षादि चार प्रमाणों का प्रमाण होना असंभव है  इस प्रकार पूर्वपक्षी के आक्षेप का आशय है ।  


भाषान्तर