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प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानांतत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानांतत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः
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=== संधि-विच्छेद: ===
# '''प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्'''
#* प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान, आनाम्
# '''तत्त्वज्ञानात्''' = तत्त्व + ज्ञानात्
# '''निःश्रेयसाधिगमः''' = निःश्रेयस + अधिगमः
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=== अर्थ: ===
==== वाक्य का विस्तृत अर्थ: ====
{| class="wikitable
! तत्व
! अर्थ
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| प्रमाण
| सत्य को जानने के साधन, जैसे प्रत्यक्ष, अनुमान, और शब्द।
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| प्रमेय
| वह जो प्रमाण से जाना जा सकता है, यानी ज्ञेय वस्तुएँ।
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| संशय
| किसी वस्तु, तथ्य या स्थिति के बारे में संदेह।
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| प्रयोजन
| किसी कार्य को करने का उद्देश्य या लाभ।
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| दृष्टान्त
| किसी तर्क या विचार को स्पष्ट करने के लिए दिया गया उदाहरण।
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| सिद्धान्त
| किसी मत या विचारधारा का स्थापित नियम।
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| अवयव
| तर्क या विचार प्रक्रिया के विभिन्न घटक।
|-
| तर्क
| किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की विचार प्रक्रिया।
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| निर्णय
| सत्य का निष्कर्ष।
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| वाद
| सत्य की खोज में किया गया संवाद।
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| जल्प
| तर्क करना केवल अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए।
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| वितण्डा
| बिना किसी सकारात्मक दृष्टिकोण के केवल विरोध करने के लिए तर्क।
|-
| हेत्वाभास
| दोषपूर्ण तर्क, जो दिखने में सही लगता है परंतु वास्तविकता में गलत होता है।
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| छल
| तर्क में भ्रम उत्पन्न करने वाली युक्तियाँ।
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| जाति
| समानता या असमानता के आधार पर गलत तर्क।
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| निग्रहस्थान
| तर्क-वितर्क में हार या पराजय के बिंदु।
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| तत्त्वज्ञान
| तत्वों (सत्य और वास्तविकता) का सही और पूर्ण ज्ञान।
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| निःश्रेयस
| परम कल्याण, मोक्ष या आत्मा की पूर्ण स्वतंत्रता।
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| अधिगमः
| प्राप्ति।
|}
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==== पूर्ण अर्थ: ====
जब व्यक्ति को प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, और निग्रहस्थान का सम्यक ज्ञान हो जाता है, तब वह तत्त्वज्ञान (सत्य और वास्तविकता का पूर्ण ज्ञान) प्राप्त करता है। इसी ज्ञान के माध्यम से '''निःश्रेयस''' (परम कल्याण या मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
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==== व्याख्या: ====
यह सूत्र न्याय दर्शन की मूलभूत शिक्षा को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि सही ज्ञान के लिए तर्क, विचार और प्रमाण का व्यवस्थित अध्ययन आवश्यक है। तत्त्वज्ञान से जीवन के अंतिम उद्देश्य, यानी निःश्रेयस, की प्राप्ति संभव है।
इसका उद्देश्य ज्ञान, तर्क और सत्य की खोज के महत्व को समझाना है, जो मनुष्य को बंधन (दुःख और अज्ञान) से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करता है।

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प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानांतत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः



संधि-विच्छेद:

  1. प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्
    • प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान, आनाम्
  2. तत्त्वज्ञानात् = तत्त्व + ज्ञानात्
  3. निःश्रेयसाधिगमः = निःश्रेयस + अधिगमः

अर्थ:

वाक्य का विस्तृत अर्थ:

तत्व अर्थ
प्रमाण सत्य को जानने के साधन, जैसे प्रत्यक्ष, अनुमान, और शब्द।
प्रमेय वह जो प्रमाण से जाना जा सकता है, यानी ज्ञेय वस्तुएँ।
संशय किसी वस्तु, तथ्य या स्थिति के बारे में संदेह।
प्रयोजन किसी कार्य को करने का उद्देश्य या लाभ।
दृष्टान्त किसी तर्क या विचार को स्पष्ट करने के लिए दिया गया उदाहरण।
सिद्धान्त किसी मत या विचारधारा का स्थापित नियम।
अवयव तर्क या विचार प्रक्रिया के विभिन्न घटक।
तर्क किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की विचार प्रक्रिया।
निर्णय सत्य का निष्कर्ष।
वाद सत्य की खोज में किया गया संवाद।
जल्प तर्क करना केवल अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए।
वितण्डा बिना किसी सकारात्मक दृष्टिकोण के केवल विरोध करने के लिए तर्क।
हेत्वाभास दोषपूर्ण तर्क, जो दिखने में सही लगता है परंतु वास्तविकता में गलत होता है।
छल तर्क में भ्रम उत्पन्न करने वाली युक्तियाँ।
जाति समानता या असमानता के आधार पर गलत तर्क।
निग्रहस्थान तर्क-वितर्क में हार या पराजय के बिंदु।
तत्त्वज्ञान तत्वों (सत्य और वास्तविकता) का सही और पूर्ण ज्ञान।
निःश्रेयस परम कल्याण, मोक्ष या आत्मा की पूर्ण स्वतंत्रता।
अधिगमः प्राप्ति।



पूर्ण अर्थ:

जब व्यक्ति को प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, और निग्रहस्थान का सम्यक ज्ञान हो जाता है, तब वह तत्त्वज्ञान (सत्य और वास्तविकता का पूर्ण ज्ञान) प्राप्त करता है। इसी ज्ञान के माध्यम से निःश्रेयस (परम कल्याण या मोक्ष) की प्राप्ति होती है।


व्याख्या:

यह सूत्र न्याय दर्शन की मूलभूत शिक्षा को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि सही ज्ञान के लिए तर्क, विचार और प्रमाण का व्यवस्थित अध्ययन आवश्यक है। तत्त्वज्ञान से जीवन के अंतिम उद्देश्य, यानी निःश्रेयस, की प्राप्ति संभव है।

इसका उद्देश्य ज्ञान, तर्क और सत्य की खोज के महत्व को समझाना है, जो मनुष्य को बंधन (दुःख और अज्ञान) से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करता है।