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<big>सिद्धान्ती के माने हुए प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द ये चारों प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि इससे सिद्ध होने वाले प्रमेय पदार्थों के पूर्व, उत्तर तथा समान काल में ये सिद्ध न हो सकने के कारण त्रिकाल में सिद्धि नहीं हो सकती । (यहां माध्यमिक बौद्ध पूर्वपक्षी का यह आशय है कि यद्यपि काल्पनिक होने से सम्पूर्ण संसार विचार के योग्य नहीं है, अतः हमारे मत में कोई प्रमाण भी विचार योग्य नहीं है, तथापि लोक में प्रसिद्ध जो प्रमाण हैं, उन्हीं से विचार करने पर वे विचार योग्य नहीं ठहरते वह यह प्रमाणों का ही अपराध है जो अपने विरोध से नहीं रह सकते, इसमें हमारा कोई अपराध नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षादिकों का प्रमाणरूर से व्यवहार नहीं हो सकता, कारण यह कि वे तीनों कालों में पदार्थों का प्रतिपादन नहीं कर सकते, जो ऐसा होता है उसका प्रमाणरूप से व्यवहार नहीं होता जैसा शश (ससे) का सींग वैसा ही यह प्रमाण पदार्थ है, अतः वैसा (प्रमाण) व्यवहार के योग्य नहीं है' ऐसा हम अनुमान द्वारा प्रमाण पदार्थों का संसार से व्यवहार नहीं हो सकता (यह सिद्ध कर सकते हैं) <br /></big> | |||
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<big>( अष्टम सूत्र की पूर्वपक्षी के अभिप्राय से शंका दिखाते हुए भाष्यकार कहते हैं कि ) - प्रक्ष्यक्ष, अनुमानादि सिद्धान्ती के प्रथमाध्याय में कहे हुए प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि उनकी प्रमेय (सिद्ध करने योग्य पदार्थ की त्रिकाल में सिद्धि नहीं हो सकती, (अर्थात् प्रमेय के सिद्धि के पूर्व, पश्चात् तथा साथ में रहना सिद्ध नहीं हो सकता यह पूर्वपक्षि मत के सूत्र का अर्थ है)<br /></big> | |||
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==== '''<big>भाषान्तर</big>''' ==== | |||
Latest revision as of 13:33, 29 March 2025
अवतरण
अथ प्रमाणपरीक्षा -
इस प्रकार सम्पूर्ण परीक्षाओं में आवश्यक होने के कारण (संशय की परीक्षा करने के पश्वाद पोटश पदार्थों में प्रथम प्रमाण परीक्षा करने वाले सूत्रकार के आक्षेप सूत्र की अवतरणिका देते हुए भाध्यकार कहते हैं कि (अब संशय की परीक्षा के पश्चाद) प्रमाण पदार्थ की परीक्षा की जाती है यद्यपि यहां पर आर्थिक क्रम से संशय की परीक्षा करने में उद्देश के क्रम में बाध आ जाता है। किन्तु प्रमाणादिकों में तो बाध का कारण न होने से उद्देश के क्रम के अनुसार प्रमेयादि पदार्थों के पूर्व में प्रमाणों की ही परीक्षा करना उचित है। उसमें भी प्रथम प्रमाणों के सामान्य लक्षण की परीक्षा की जाती है, क्योंकि सामान्य लक्षण पूर्वक ही उनके विशेष लक्षणों की परीक्षा करना उचित है जिसमें 'उपलब्धि साधनं प्रमाणम्' ज्ञान के साधन प्रमाण होते हैं यह प्रत्यक्षादि प्रमाणों का सामान्य लक्षण है, जो प्रत्यक्षादि प्रमाणों में रहता है) (उसमें पूर्वपक्षी के मत से प्रत्यक्षादि प्रमाणों के प्रमाण होने पर आपत्ति दिखाते हुए सूत्रकार कहते हैं)-
सूत्र
प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः 2/1/8
पदच्छेद
प्रत्यक्षादीनां, अप्रमाण्यं, त्रैकाल्यासिद्धेः ।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | प्रत्यक्षादीनां | प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द में |
| 2 | अप्रमाण्यं | प्रमाणता नहीं हो सकती |
| 3 | त्रैकाल्यासिद्धेः | उनके प्रमेय पदार्थों के पूर्व, उत्तर तथा समान काल ऐसी त्रिकाल में सिद्धि न होने से |
सूत्रकार
सिद्धान्ती के माने हुए प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द ये चारों प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि इससे सिद्ध होने वाले प्रमेय पदार्थों के पूर्व, उत्तर तथा समान काल में ये सिद्ध न हो सकने के कारण त्रिकाल में सिद्धि नहीं हो सकती । (यहां माध्यमिक बौद्ध पूर्वपक्षी का यह आशय है कि यद्यपि काल्पनिक होने से सम्पूर्ण संसार विचार के योग्य नहीं है, अतः हमारे मत में कोई प्रमाण भी विचार योग्य नहीं है, तथापि लोक में प्रसिद्ध जो प्रमाण हैं, उन्हीं से विचार करने पर वे विचार योग्य नहीं ठहरते वह यह प्रमाणों का ही अपराध है जो अपने विरोध से नहीं रह सकते, इसमें हमारा कोई अपराध नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षादिकों का प्रमाणरूर से व्यवहार नहीं हो सकता, कारण यह कि वे तीनों कालों में पदार्थों का प्रतिपादन नहीं कर सकते, जो ऐसा होता है उसका प्रमाणरूप से व्यवहार नहीं होता जैसा शश (ससे) का सींग वैसा ही यह प्रमाण पदार्थ है, अतः वैसा (प्रमाण) व्यवहार के योग्य नहीं है' ऐसा हम अनुमान द्वारा प्रमाण पदार्थों का संसार से व्यवहार नहीं हो सकता (यह सिद्ध कर सकते हैं)
भाष्यकार
( अष्टम सूत्र की पूर्वपक्षी के अभिप्राय से शंका दिखाते हुए भाष्यकार कहते हैं कि ) - प्रक्ष्यक्ष, अनुमानादि सिद्धान्ती के प्रथमाध्याय में कहे हुए प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि उनकी प्रमेय (सिद्ध करने योग्य पदार्थ की त्रिकाल में सिद्धि नहीं हो सकती, (अर्थात् प्रमेय के सिद्धि के पूर्व, पश्चात् तथा साथ में रहना सिद्ध नहीं हो सकता यह पूर्वपक्षि मत के सूत्र का अर्थ है)