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यथोक्ताध्यवसायादेव, तद्विशेषापेक्षात्, संशये, न, संशयो, न, अत्यन्तसंशयो, वा। | यथोक्ताध्यवसायादेव, तद्विशेषापेक्षात्, संशये, न, संशयो, न, अत्यन्तसंशयो, वा। | ||
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==== <big>'''पदपदार्थ'''</big> ==== | |||
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!संख्या | |||
!पद | |||
!अर्थ | |||
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|'''यथोक्तध्यवसायादेव''' | |||
|द्वितीयाध्याय के प्रथमाह्निक के २३वें सूत्र में कहे हुए समानधर्म आदि के अध्यवसाय (ज्ञान) से ही | |||
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|'''तद्विशेषापेक्षात्''' | |||
|जो समानधर्मादि वाले वृक्ष तथा पुरुष पदार्थों के विशेष (भेदक) धर्म के ज्ञान की अपेक्षा करता है उससे | |||
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|'''संशये''' | |||
|संशय की उत्पत्ति मानने के कारण | |||
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|'''न''' | |||
|नहीं होगा | |||
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|'''असंशयः''' | |||
|संशय का न होना | |||
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|'''न''' | |||
|नहीं होगा | |||
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|'''अत्यन्त संशय''' | |||
|सदा सन्देह | |||
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|'''वा''' | |||
|अथवा | |||
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==== <big>'''सूत्रकार'''</big> ==== | |||
पूर्वपक्षी के दिये हुये संशय का न हो सकना, तथा सदासंशय का उत्पन्न होना ये दोनों दोष नहीं हो सकते, क्योंकि संशयलक्षण के सूत्र में समानधर्म आदि के ज्ञान ही से जो उनके भेद करने वाले विशेष धर्म के ज्ञान की अपेक्षा करता है, उसी से संशय की उत्पत्ति मानने के कारण, विशेष धर्म का ज्ञान न रहते संशय होने से संशय नहीं होगा यह नहीं हो सकता तथा हस्तपाद, शाखा इत्यादि विशेष धर्म के दर्शन से यह वृक्ष है अथवा पुरुष ऐसा संशय नहीं रह सकता, अतः सर्वदा संशय होता रहेगा यह भी पूर्वपक्षी का दिखाया हुआ दोष नहीं आ सकता ( अर्थात् बिना विशेषण के समानधर्म की उपपत्ति आदि को संशय का कारण कहा जाय तो उसकी उपपत्ति के पश्चात् न करने से प्रथम भी न करेगी इस कारण संशय न होने की आपत्ति अथवा प्रथम भी करने से पश्चात् भी करेगी जिससे सर्वदा संशय होने की आपत्ति आयगी । किन्तु दूरता आदि विशेष दोषों के न दिखाने रूप विशेषणयुक्त ही समानधर्म की उपपत्ति आदि को संशय का कारण मानना सिद्धान्ती को अभिमत है इस कारण पूर्वपक्षी के दिखाये उपरोक्त दोनों दोष न हो सकेंगे | |||
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==== <big>'''भाष्यकार'''</big> ==== | |||
Latest revision as of 13:33, 28 March 2025
सूत्र
यथोक्ताध्यवसायादेव तद्विशेषापेक्षात् संशये नासंशयो नात्यन्तसंशयो वा 2/1/6
पदच्छेद
यथोक्ताध्यवसायादेव, तद्विशेषापेक्षात्, संशये, न, संशयो, न, अत्यन्तसंशयो, वा।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | यथोक्तध्यवसायादेव | द्वितीयाध्याय के प्रथमाह्निक के २३वें सूत्र में कहे हुए समानधर्म आदि के अध्यवसाय (ज्ञान) से ही |
| 2 | तद्विशेषापेक्षात् | जो समानधर्मादि वाले वृक्ष तथा पुरुष पदार्थों के विशेष (भेदक) धर्म के ज्ञान की अपेक्षा करता है उससे |
| 3 | संशये | संशय की उत्पत्ति मानने के कारण |
| 4 | न | नहीं होगा |
| 5 | असंशयः | संशय का न होना |
| 6 | न | नहीं होगा |
| 7 | अत्यन्त संशय | सदा सन्देह |
| 8 | वा | अथवा |
सूत्रकार
पूर्वपक्षी के दिये हुये संशय का न हो सकना, तथा सदासंशय का उत्पन्न होना ये दोनों दोष नहीं हो सकते, क्योंकि संशयलक्षण के सूत्र में समानधर्म आदि के ज्ञान ही से जो उनके भेद करने वाले विशेष धर्म के ज्ञान की अपेक्षा करता है, उसी से संशय की उत्पत्ति मानने के कारण, विशेष धर्म का ज्ञान न रहते संशय होने से संशय नहीं होगा यह नहीं हो सकता तथा हस्तपाद, शाखा इत्यादि विशेष धर्म के दर्शन से यह वृक्ष है अथवा पुरुष ऐसा संशय नहीं रह सकता, अतः सर्वदा संशय होता रहेगा यह भी पूर्वपक्षी का दिखाया हुआ दोष नहीं आ सकता ( अर्थात् बिना विशेषण के समानधर्म की उपपत्ति आदि को संशय का कारण कहा जाय तो उसकी उपपत्ति के पश्चात् न करने से प्रथम भी न करेगी इस कारण संशय न होने की आपत्ति अथवा प्रथम भी करने से पश्चात् भी करेगी जिससे सर्वदा संशय होने की आपत्ति आयगी । किन्तु दूरता आदि विशेष दोषों के न दिखाने रूप विशेषणयुक्त ही समानधर्म की उपपत्ति आदि को संशय का कारण मानना सिद्धान्ती को अभिमत है इस कारण पूर्वपक्षी के दिखाये उपरोक्त दोनों दोष न हो सकेंगे