1/1/26: Difference between revisions

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=== श्लोक: ===
=== तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः ===
'''स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात् 1/1/26'''
----


=== संधि विच्छेद: ===
==== 1. सन्धि विच्छेद: ====
'''तन्त्र + अधिकरण + अभ्युपगम + संस्थितिः + सिद्धान्तः'''


# '''स + चतुर्विधः + सर्व + तन्त्र + प्रतितन्त्र + अधि + करण + आभ्युपगम + संस्थिति + अर्थ + अन्तर + भावात्'''
==== 2. अर्थ: ====
#* '''स''': वह।
#* '''चतुर्विधः''': चार प्रकार का।
#* '''सर्व''': सर्व, सभी।
#* '''तन्त्र''': तंत्र, प्रणाली या साधन।
#* '''प्रतितन्त्र''': विपरीत तंत्र, विरोधी तंत्र।
#* '''अधि''': अधिकार, संबंधित।
#* '''करण''': कारण, साधन।
#* '''आभ्युपगम''': अभिप्रेत, प्रयोजन की ओर अग्रसर होना।
#* '''संस्थिति''': स्थिति, स्थिति की व्यवस्था।
#* '''अर्थ''': उद्देश्य, कारण।
#* '''अन्तर''': अंतर, भिन्नता।
#* '''भावात्''': कारण से, या किसी कारण के कारण।


----
* '''तन्त्र''': प्रणाली, पद्धति, या एक दृष्टिकोण।
* '''अधिकरण''': विषय या प्रसंग।
* '''अभ्युपगम''': स्वीकृति, मान्यता या प्रस्ताव।
* '''संस्थितिः''': स्थायित्व, स्थापित रूप या संरचना।
* '''सिद्धान्तः''': सिद्ध हुआ मत या मान्यता।


=== अर्थ: ===
'''अर्थ (संयुक्त रूप में):'''
यह श्लोक कहता है:


'''वह चार प्रकार का होता है, क्योंकि सभी तंत्रों और उनके विपरीत तंत्रों में संपर्क स्थापित करने की स्थिति विभिन्न उद्देश्य और कारणों के बीच अंतर के कारण होती है।'''
किसी विषय (अधिकरण) के आधार पर एक दृष्टिकोण (तन्त्र) को स्वीकृत (अभ्युपगम) करते हुए स्थिर (संस्थितिः) रूप से स्थापित विचार (सिद्धान्त)।


'''अर्थात''', किसी भी तंत्र (व्यवस्था) का कार्य और स्थिति तब समझी जा सकती है, जब हम उस तंत्र के संबंधित साधनों और उनके विपरीत साधनों के संपर्क की व्यवस्था को ध्यान में रखें।
==== 3. व्याख्या: ====
----
यह सूत्र दर्शन और तर्कशास्त्र में सिद्धान्त की प्रकृति को समझाता है।


=== व्याख्या: ===
* '''तन्त्र''': किसी पद्धति या प्रणाली का सुझाव देता है।
* '''अधिकरण''': वह प्रसंग या विषय जिसमें तर्क किया जा रहा हो।
* '''अभ्युपगम''': वह स्वीकृति या प्रारंभिक प्रस्ताव जिससे तर्क आरंभ होता है।
* '''संस्थितिः''': इसका अर्थ है किसी दृष्टिकोण को ठोस और स्थायी बनाना।
* '''सिद्धान्त:''' वह अंतिम निष्कर्ष जिसे सब स्वीकार करते हैं।


# '''चतुर्विध''':
इस सूत्र का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि सिद्धान्त तक पहुँचने के लिए एक सुव्यवस्थित दृष्टिकोण, एक विशिष्ट प्रसंग, स्वीकृत प्रस्ताव और स्थायी आधार की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया दर्शन में विचारों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करती है।
#* इसका अर्थ है चार प्रकार का। यहाँ यह संकेत कर रहा है कि किसी विशेष प्रणाली (तंत्र) में चार प्रकार के तत्व या सिद्धांत हो सकते हैं।
#* यह तात्पर्य है कि किसी तंत्र के चार मुख्य घटक होते हैं जिनसे वह तंत्र संचालित होता है।
# '''सर्वतन्त्र''' और '''प्रतितन्त्र''':
#* '''सर्वतन्त्र''' का अर्थ है वह तंत्र जो मुख्य है या सामान्य रूप से स्वीकार्य है।
#* '''प्रतितन्त्र''' का अर्थ है वह तंत्र जो इसके विपरीत या विरोधी है।
#* यह किसी तंत्र के दोनों पक्षों या दृष्टिकोणों को दिखाता है, जिसमें एक पक्ष सामान्य होता है और दूसरा पक्ष विरोधाभासी या विपरीत होता है।
# '''आभ्युपगम संस्थिति''':
#* यह संकेत करता है कि किसी भी तंत्र का उद्देश्य और स्थिति तब ही समझी जा सकती है जब हम इसके अन्य पक्षों या विरोधी तंत्रों के संपर्क को समझें।
#* यह तात्पर्य है कि किसी तंत्र का कार्य तभी सही तरीके से कार्यान्वित होता है जब हम सभी संबंधित तंत्रों की स्थिति और स्थिति के विभिन्न पहलुओं को समझते हैं।
# '''अर्थान्तरभावात्''':
#* यहाँ पर '''अर्थान्तर''' से यह कहा जा रहा है कि तंत्रों का कार्य अलग-अलग उद्देश्यों और कारणों के आधार पर होता है, जो अंतर की स्थिति उत्पन्न करते हैं।
#* इसका मतलब यह है कि किसी तंत्र की कार्यप्रणाली और स्थिति में भिन्नता होती है, जो अलग-अलग परिस्थितियों और उद्देश्यों पर निर्भर करती है।


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==== 4. उदाहरण: ====


=== उदाहरण: ===
* '''तन्त्र''': "न्याय दर्शन की प्रणाली"।
* '''अधिकरण''': "ज्ञान की परिभाषा"।
* '''अभ्युपगम''': "ज्ञान को प्रमाण माना जाए"।
* '''संस्थितिः''': "ज्ञान को अनुभूति, स्मृति और भ्रम से भिन्न ठहराना"।
* '''सिद्धान्तः''': "ज्ञान, यथार्थ को प्रकट करने वाली सत्तावस्था है।"


# '''तंत्र और विपरीत तंत्र''':
==== 5. निष्कर्ष: ====
#* जैसे किसी संगठन में कार्यप्रणाली (तंत्र) होती है, लेकिन उसके भीतर या बाहर कुछ विरोधी विचारधाराएँ (प्रतितन्त्र) भी हो सकती हैं, जो संगठन के उद्देश्यों को प्रभावित करती हैं।
यह सूत्र यह स्पष्ट करता है कि किसी भी सिद्धान्त को स्थापित करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। प्रसंग और प्रणाली को ध्यान में रखकर प्रस्ताव को स्वीकार करना और उसे स्थायी रूप से स्थापित करना ही दर्शनशास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।
#* इसी तरह से किसी वैज्ञानिक सिद्धांत को समझने के लिए उस सिद्धांत के साथ जुड़े और विरोधी तंत्रों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
# '''न्याय दर्शन में''':
#* न्याय दर्शन में तर्क (तन्त्र) और उसके विरोधी तर्क (प्रतितन्त्र) के बीच अंतर की स्थिति को समझना जरूरी है, ताकि एक सही निष्कर्ष तक पहुँच सकें।
 
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=== निष्कर्ष: ===
'''स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात्''' श्लोक यह सिखाता है कि किसी तंत्र (प्रणाली) के कार्य और स्थिति को समझने के लिए उसके विभिन्न घटकों, साधनों, और उनके विरोधी घटकों का संपर्क और उद्देश्य समझना आवश्यक है। यह विशेष रूप से किसी तंत्र की पूर्णता और कार्यप्रणाली को समझने में सहायक होता है।

Latest revision as of 16:34, 8 January 2025

तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः

1. सन्धि विच्छेद:

तन्त्र + अधिकरण + अभ्युपगम + संस्थितिः + सिद्धान्तः

2. अर्थ:

  • तन्त्र: प्रणाली, पद्धति, या एक दृष्टिकोण।
  • अधिकरण: विषय या प्रसंग।
  • अभ्युपगम: स्वीकृति, मान्यता या प्रस्ताव।
  • संस्थितिः: स्थायित्व, स्थापित रूप या संरचना।
  • सिद्धान्तः: सिद्ध हुआ मत या मान्यता।

अर्थ (संयुक्त रूप में):

किसी विषय (अधिकरण) के आधार पर एक दृष्टिकोण (तन्त्र) को स्वीकृत (अभ्युपगम) करते हुए स्थिर (संस्थितिः) रूप से स्थापित विचार (सिद्धान्त)।

3. व्याख्या:

यह सूत्र दर्शन और तर्कशास्त्र में सिद्धान्त की प्रकृति को समझाता है।

  • तन्त्र: किसी पद्धति या प्रणाली का सुझाव देता है।
  • अधिकरण: वह प्रसंग या विषय जिसमें तर्क किया जा रहा हो।
  • अभ्युपगम: वह स्वीकृति या प्रारंभिक प्रस्ताव जिससे तर्क आरंभ होता है।
  • संस्थितिः: इसका अर्थ है किसी दृष्टिकोण को ठोस और स्थायी बनाना।
  • सिद्धान्त: वह अंतिम निष्कर्ष जिसे सब स्वीकार करते हैं।

इस सूत्र का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि सिद्धान्त तक पहुँचने के लिए एक सुव्यवस्थित दृष्टिकोण, एक विशिष्ट प्रसंग, स्वीकृत प्रस्ताव और स्थायी आधार की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया दर्शन में विचारों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करती है।

4. उदाहरण:

  • तन्त्र: "न्याय दर्शन की प्रणाली"।
  • अधिकरण: "ज्ञान की परिभाषा"।
  • अभ्युपगम: "ज्ञान को प्रमाण माना जाए"।
  • संस्थितिः: "ज्ञान को अनुभूति, स्मृति और भ्रम से भिन्न ठहराना"।
  • सिद्धान्तः: "ज्ञान, यथार्थ को प्रकट करने वाली सत्तावस्था है।"

5. निष्कर्ष:

यह सूत्र यह स्पष्ट करता है कि किसी भी सिद्धान्त को स्थापित करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। प्रसंग और प्रणाली को ध्यान में रखकर प्रस्ताव को स्वीकार करना और उसे स्थायी रूप से स्थापित करना ही दर्शनशास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।