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Latest revision as of 13:06, 4 April 2025
सूत्र
त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः 2/1/12
पदच्छेद
त्रैकाल्यासिद्धेः, प्रतिषेधानुपपत्तिः ।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | त्रैकाल्यासिद्धः | त्रिकाल सम्बन्ध के न होने के कारण |
| 2 | प्रतिषेधानुपपत्तिः | पूर्वपक्षी का निषेध नहीं बन सकता |
सूत्रकार
क्योंकि पूर्वपक्षी प्रतिषेधरूप प्रमाण पूर्व में हो तो बिना निषेध के किसका निषेध किया जायगा । यदि प्रतिषेध पश्चात् माना जाय तो प्रतिषेध के न होने के कारण प्रतिषेध योग्य (प्रत्यक्षादिकों का अप्रमाण होना) न बन सकेगा। और यदि प्रतिषेधरूप प्रमाण तथा प्रतिषेध योग्य (प्रत्यक्षादिकों का प्रमाण न होना) दोनों एक काल में माने जांय तो प्रतिषेध योग्य (प्रत्यक्षादि प्रमाणों के मानने के कारण पूर्वपक्षी का निषेध करना व्यर्थ हो जायगा। इस प्रकार पूर्वपक्षी के 'प्रत्यक्षादि' प्रमाण नहीं हो सकने में 'काल की सिद्धि न होने के कारण' इस वाक्य की सिद्धि न होने के कारण प्रत्यक्षादि प्रमाण हैं यह सिद्ध हो जाता है।
भाष्यकार
(१२ वें सिद्धान्ती के पक्ष के सूत्र की भाष्यकार व्याख्या करते हैं कि) - इस सिद्धान्ती के सूत्र की. ऐसी व्याख्या है कि यदि पूर्वपक्षी का प्रतिषेधरूप प्रमाण पूर्वकाल में हो तो निषेध के योग्य न होने के कारण किस का निषेध किया जायगा। यदि निषेध, निषेध योग्य के पश्चात् उत्तरकाल में हो तो निषेधरूप प्रमाण के न होने से, प्रतिषेध योग्य (प्रत्यक्षादिकों की अप्रमाणता) की सिद्धि न हो सकेगी और यदि निषेध तथा निषेध योग्य एककाल में ही माने जांय तो निषेध योग्य प्रत्यक्षादि प्रमाणों को मानने के कारण पूर्वपक्षी का निषेध व्यर्थ हो जायगा। इस प्रकार ‘प्रत्यक्षादि प्रमाण नहीं हो सकते’
इस वाक्य के न बनने से यह सिद्ध होता है कि प्रत्यक्षादि चार प्रमाण हैं ।