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तिस्त्रः कथा भवन्ति वादौ जल्पो वितण्डा चेति
तिस्त्रः कथा भवन्ति वादौ जल्पो वितण्डा चेति


वाद, जल्प तथा वितण्डा नाम की तीन कथा होती हैं उनमें से यह सूत्र वाद का है  
वाद, जल्प तथा वितण्डा नाम की तीन कथा होती हैं उनमें से यह सूत्र वाद का है  
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==== '''<big>सूत्र</big>''' ====
प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोवपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः 1/2/1
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==== '''<big>पदच्छेद</big>''' ====
प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः, सिद्धान्ताविरुद्धः, पञ्चावयवोवपन्नः , पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो , वादः।
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==== '''Word Meanings''' ====
{| class="wikitable"
! Sanskrit Term !! Hindi Meaning !! English Meaning
|-
| प्रमाण (pramāṇa) || प्रमाण – ज्ञान का साधन || Means of valid knowledge
|-
| तर्क (tarka) || तर्क – तर्कशक्ति या अनुमान || Logical reasoning or hypothetical reasoning
|-
| साधन (sādhana) || साधन – प्रतिपादन के साधन || Means or tools of proof
|-
| उपालम्भ (upālambha) || उपालम्भ – आलोचना या खंडन || Refutation or critique
|-
| सिद्धान्ताविरुद्ध (siddhāntā-viruddha) || सिद्धांत के विरोध में नहीं || Not contrary to established doctrines
|-
| पञ्चावयवोपपन्न (pañcāvayava-upapanna) || पाँच अवयवों से युक्त || Structured in five components (of a syllogism)
|-
| पक्ष (pakṣa) || पक्ष – प्रस्तावित पक्ष || The thesis or proposition
|-
| प्रतिपक्ष (pratipakṣa) || प्रतिपक्ष – विपक्ष || The counter-thesis or opposing view
|-
| परिग्रह (parigraha) || ग्रहण करना – स्वीकृति || Consideration or acceptance
|-
| वादः (vādaḥ) || वाद – युक्तिपूर्ण संवाद || Rational debate or philosophical discussion
|}


'''<big>सूत्र-</big>''' 
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==== S-V-O triples ====
 
{| class="wikitable"
! विषय (S) !! संबंध (V) !! वस्तु (O)
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| वाद || का आधार है || प्रमाण
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| वाद || का आधार है || तर्क
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| वाद || का आधार है || साधन
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| वाद || में सम्मिलित है || उपालम्भ
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| वाद || के विरोध में नहीं है || सिद्धान्त
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| वाद || में निहित है || पंचावयव
|-
| वाद || में स्वीकार किया गया है || पक्ष
|-
| वाद || में स्वीकार किया गया है || प्रतिपक्ष
|}


प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोवपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः 1/2/1


'''<big>पदच्छेद-</big>'''


प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः, सिद्धान्ताविरुद्धः, पञ्चावयवोवपन्नः , पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो , वादः।
{| class="wikitable"
! Subject (S) !! Relation (V) !! Object (O)
|-
| Vāda || is based on || Pramāṇa (means of valid knowledge)
|-
| Vāda || is based on || Tarka (logical reasoning)
|-
| Vāda || is based on || Sādhana (means/tools of proof)
|-
| Vāda || includes || Upālambha (critique or refutation)
|-
| Vāda || is not opposed to || Siddhānta (established doctrine)
|-
| Vāda || is structured with || Pañcāvayava (five-membered syllogism)
|-
| Vāda || has accepted || Pakṣa (proposition)
|-
| Vāda || has accepted || Pratipakṣa (counter-proposition)
|}
 
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=== '''<small>पदपदार्थ-</small>''' ===
==== '''<big>पदपदार्थ</big>''' ====
{| class="wikitable"
{| class="wikitable"
!संख्‍या
!संख्‍या
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|वाद नामक प्रथम कथा होती है
|वाद नामक प्रथम कथा होती है
|}
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=== '''सूत्रकार-''' ===
==== '''सूत्रकार''' ====
प्रथमाह्निक में प्रमाण से लेकर निर्णवपर्यन्त नव पदार्थों के वर्णन के पश्चात् दितीया-हिक में तीन प्रकार की बादादि कथाओं में से प्रथम बाद कथा का बर्णन करना उचित होने से उसका लक्षण सूत्रकार ने ऐसा किया है कि जिस कथा में प्रमाण एवं तर्क से स्वपक्ष की स्थापना तथा परपक्ष के साधक हेतु का खण्डन किया जाता है, एवं स्वीकृत सिद्धान्त का विरोध न होने से जिसमें विरोध नामक हेत्वामासबादी के खण्डनार्थ दिया जाता है, तथा जिसमें प्रतिश्च। आदि चाँच अवयव सो होते हैं जिससे अवयवों में अधिकता तथा न्यूनता रू। निग्रह स्थान भी वादी के खण्डन के लिये दिए जा सकते हैं, ऐसे पक्ष प्रतिपक्ष अर्थात् (एक विषय में विरुद्ध दो धर्मों) का स्वोकार होता है, उसे वाद नामक प्रथम कथा कहते हैं। यद्यपि निर्णय के अनुकूल होने के कारण प्रथम आद्धिक में ही बादकथा का लक्षण करना युक्त या तथापि तीनप्रकार की कथाओं के अन्तर्गत होने से द्वितीयाडिक में ही उसका भी वर्णन सूत्रकार कर रहे हैं। जिसमें अनेक वक्ताओं से युक्त विचार के पदार्थ को विषय करने वाले बाक्यों के सन्दर्भ की कथा कहते हैं, वह तीन ही प्रकार की होती है (ऐसा 'पक्षप्रतिपचपरिग्रहः' इस सूत्र के पद से सूचित होता है।) जिसमें गुरु आदि के साथ बाद कया, एवं जय की इच्छा करने वाले के साथ जल्प, एवं वितण्डानामक दो कया होती है यह विशेषता है) इस सूत्र में 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः' इस पद में 'प्रमाणतर्कसाधना' तथा 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः' ऐसा मध्यम पद लोधीः समास जानना चाहिये। (यथपि वितण्डाकथा में पक्ष तथा प्रतिपक्ष का परिग्रह होता है, तथापि प्रतिपक्ष (विरुद्धपक्ष) की स्थापना नहीं होती, क्योंकि उसमें साधन नहीं होता,  
प्रथमाह्निक में प्रमाण से लेकर निर्णवपर्यन्त नव पदार्थों के वर्णन के पश्चात् दितीया-हिक में तीन प्रकार की बादादि कथाओं में से प्रथम बाद कथा का बर्णन करना उचित होने से उसका लक्षण सूत्रकार ने ऐसा किया है कि जिस कथा में प्रमाण एवं तर्क से स्वपक्ष की स्थापना तथा परपक्ष के साधक हेतु का खण्डन किया जाता है, एवं स्वीकृत सिद्धान्त का विरोध न होने से जिसमें विरोध नामक हेत्वामासबादी के खण्डनार्थ दिया जाता है, तथा जिसमें प्रतिश्च। आदि चाँच अवयव सो होते हैं जिससे अवयवों में अधिकता तथा न्यूनता रू। निग्रह स्थान भी वादी के खण्डन के लिये दिए जा सकते हैं, ऐसे पक्ष प्रतिपक्ष अर्थात् (एक विषय में विरुद्ध दो धर्मों) का स्वोकार होता है, उसे वाद नामक प्रथम कथा कहते हैं। यद्यपि निर्णय के अनुकूल होने के कारण प्रथम आद्धिक में ही बादकथा का लक्षण करना युक्त या तथापि तीनप्रकार की कथाओं के अन्तर्गत होने से द्वितीयाडिक में ही उसका भी वर्णन सूत्रकार कर रहे हैं। जिसमें अनेक वक्ताओं से युक्त विचार के पदार्थ को विषय करने वाले बाक्यों के सन्दर्भ की कथा कहते हैं, वह तीन ही प्रकार की होती है (ऐसा 'पक्षप्रतिपचपरिग्रहः' इस सूत्र के पद से सूचित होता है।) जिसमें गुरु आदि के साथ बाद कया, एवं जय की इच्छा करने वाले के साथ जल्प, एवं वितण्डानामक दो कया होती है यह विशेषता है) इस सूत्र में 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः' इस पद में 'प्रमाणतर्कसाधना' तथा 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः' ऐसा मध्यम पद लोधीः समास जानना चाहिये। (यथपि वितण्डाकथा में पक्ष तथा प्रतिपक्ष का परिग्रह होता है, तथापि प्रतिपक्ष (विरुद्धपक्ष) की स्थापना नहीं होती, क्योंकि उसमें साधन नहीं होता,  
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==== '''<big>भाष्यकार</big>''' ====
'''<big>भाष्यकार-</big>'''  
 
एक आश्रय में रहने वाले विरुद्ध धर्मो को परस्पर विरोध होने के कारण पक्ष तथा प्रतिपक्ष कहते हैं, जैसे बारमा है तथा नहीं है ( प्रतिपक्ष है) अनेक आमय में रहने वाले विरुद्धचर्म पक्ष तथा प्रतिपक्ष नहीं होते, जैसे भारमा नित्य है और दुरि अनित्य है (यह पक्ष मतिपक्ष नहीं है सूत्र में परिध शब्द का स्वीकार की व्यवस्था यह अर्थ है। वह यद इस प्रकार का पक्ष तथा प्रतिपक्ष का मानना ही बड नामक प्रयर कया का कक्षण है। उसका 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्मः यह विशेषण है। जिसका प्रमाण तथा तर्क से जिसमें पक्ष की स्थापना होती है एवं प्रमाण तथा तर्क से दूसरे के पक्ष का खण्डन होता है ऐसा अर्थ है क्योंकि इस नाथ कथा में प्रत्यक्षादि प्रमाण और तर्क से भी स्वपक्ष का साधन, पर्व दूसरे विरोधी पक्ष का खण्डन मी किया जाता है, इस कारण सूत्र के 'प्रमाणतर्कसाधनोपाहरुम इस पद में साधनशब्द का अब अपने पक्ष की स्थापना करना भऔर उपाळंम शब्द का अर्थ है विरोषि पक्ष का निवेध (सण्डन)। वे दोनों स्वपक्ष की स्थापना तथा विरोधि पक्ष का साण्जन, दोनों पक्षों में (व्यतिषक्तो जुड़े हुए अनुबद्ध परस्पर में सम्बद्ध तब तक होते हैं, जिस समय तक एक की निवृति और दूसरे की स्थिति नहीं ठीक होती। जिस पक्ष की निवृत्चि होता है उसका उपार्थम (खण्डन) तथा जो पक्ष स्थिर हो जाता है उस पक्ष का साधन (स्थापना) होती है (नागे 'सिद्धान्ताविरुद्धः' इस विशेषण की सार्थकता दिखाते हुए माष्यकार कहते हैं कि)-जल्पकया में आगे निग्रह स्थानों का उपयोग करना (आगे करेंगे जिससे बाद कथा में निग्रह स्थानों के उपयोग का निषेष प्राप्त होता है।
एक आश्रय में रहने वाले विरुद्ध धर्मो को परस्पर विरोध होने के कारण पक्ष तथा प्रतिपक्ष कहते हैं, जैसे बारमा है तथा नहीं है ( प्रतिपक्ष है) अनेक आमय में रहने वाले विरुद्धचर्म पक्ष तथा प्रतिपक्ष नहीं होते, जैसे भारमा नित्य है और दुरि अनित्य है (यह पक्ष मतिपक्ष नहीं है सूत्र में परिध शब्द का स्वीकार की व्यवस्था यह अर्थ है। वह यद इस प्रकार का पक्ष तथा प्रतिपक्ष का मानना ही बड नामक प्रयर कया का कक्षण है। उसका 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्मः यह विशेषण है। जिसका प्रमाण तथा तर्क से जिसमें पक्ष की स्थापना होती है एवं प्रमाण तथा तर्क से दूसरे के पक्ष का खण्डन होता है ऐसा अर्थ है क्योंकि इस नाथ कथा में प्रत्यक्षादि प्रमाण और तर्क से भी स्वपक्ष का साधन, पर्व दूसरे विरोधी पक्ष का खण्डन मी किया जाता है, इस कारण सूत्र के 'प्रमाणतर्कसाधनोपाहरुम इस पद में साधनशब्द का अब अपने पक्ष की स्थापना करना भऔर उपाळंम शब्द का अर्थ है विरोषि पक्ष का निवेध (सण्डन)। वे दोनों स्वपक्ष की स्थापना तथा विरोधि पक्ष का साण्जन, दोनों पक्षों में (व्यतिषक्तो जुड़े हुए अनुबद्ध परस्पर में सम्बद्ध तब तक होते हैं, जिस समय तक एक की निवृति और दूसरे की स्थिति नहीं ठीक होती। जिस पक्ष की निवृत्चि होता है उसका उपार्थम (खण्डन) तथा जो पक्ष स्थिर हो जाता है उस पक्ष का साधन (स्थापना) होती है (नागे 'सिद्धान्ताविरुद्धः' इस विशेषण की सार्थकता दिखाते हुए माष्यकार कहते हैं कि)-जल्पकया में आगे निग्रह स्थानों का उपयोग करना (आगे करेंगे जिससे बाद कथा में निग्रह स्थानों के उपयोग का निषेष प्राप्त होता है।
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'''<big>भाषान्तर-</big>'''
==== '''<big>भाषान्तर</big>''' ====
 
Discussion is the adoption of one of two opposing sides. What is adopted is analysed in the form of five members, and defended by the aid of any of the means of right knowledge, while its opposite is assailed by confutation, without deviation from the established tenets.
Discussion is the adoption of one of two opposing sides. What is adopted is analysed in the form of five members, and defended by the aid of any of the means of right knowledge, while its opposite is assailed by confutation, without deviation from the established tenets.

Latest revision as of 20:36, 10 April 2025

अवतरण

तिस्त्रः कथा भवन्ति वादौ जल्पो वितण्डा चेति

वाद, जल्प तथा वितण्डा नाम की तीन कथा होती हैं उनमें से यह सूत्र वाद का है


सूत्र

प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोवपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः 1/2/1


पदच्छेद

प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः, सिद्धान्ताविरुद्धः, पञ्चावयवोवपन्नः , पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो , वादः।


Word Meanings

Sanskrit Term Hindi Meaning English Meaning
प्रमाण (pramāṇa) प्रमाण – ज्ञान का साधन Means of valid knowledge
तर्क (tarka) तर्क – तर्कशक्ति या अनुमान Logical reasoning or hypothetical reasoning
साधन (sādhana) साधन – प्रतिपादन के साधन Means or tools of proof
उपालम्भ (upālambha) उपालम्भ – आलोचना या खंडन Refutation or critique
सिद्धान्ताविरुद्ध (siddhāntā-viruddha) सिद्धांत के विरोध में नहीं Not contrary to established doctrines
पञ्चावयवोपपन्न (pañcāvayava-upapanna) पाँच अवयवों से युक्त Structured in five components (of a syllogism)
पक्ष (pakṣa) पक्ष – प्रस्तावित पक्ष The thesis or proposition
प्रतिपक्ष (pratipakṣa) प्रतिपक्ष – विपक्ष The counter-thesis or opposing view
परिग्रह (parigraha) ग्रहण करना – स्वीकृति Consideration or acceptance
वादः (vādaḥ) वाद – युक्तिपूर्ण संवाद Rational debate or philosophical discussion

S-V-O triples

विषय (S) संबंध (V) वस्तु (O)
वाद का आधार है प्रमाण
वाद का आधार है तर्क
वाद का आधार है साधन
वाद में सम्मिलित है उपालम्भ
वाद के विरोध में नहीं है सिद्धान्त
वाद में निहित है पंचावयव
वाद में स्वीकार किया गया है पक्ष
वाद में स्वीकार किया गया है प्रतिपक्ष


Subject (S) Relation (V) Object (O)
Vāda is based on Pramāṇa (means of valid knowledge)
Vāda is based on Tarka (logical reasoning)
Vāda is based on Sādhana (means/tools of proof)
Vāda includes Upālambha (critique or refutation)
Vāda is not opposed to Siddhānta (established doctrine)
Vāda is structured with Pañcāvayava (five-membered syllogism)
Vāda has accepted Pakṣa (proposition)
Vāda has accepted Pratipakṣa (counter-proposition)

पदपदार्थ

संख्‍या तत्व अर्थ
1 प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः प्रमाण तथा तर्क द्वारा पक्ष का साधन एवं परपक्ष का खंडन करना
2 सिद्धान्ताविरुद्धः स्वीकृत सिद्धान्त का विरोध न करने वाला
3 पञ्चावयवोपपन्नः प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन – इन पाँच अवयवों से युक्त
4 पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः एक विषय में विरुद्ध दो धर्मों को ग्रहण करने वाले पक्ष एवं प्रतिपक्ष का स्वीकार
5 वादः वाद नामक प्रथम कथा होती है

सूत्रकार

प्रथमाह्निक में प्रमाण से लेकर निर्णवपर्यन्त नव पदार्थों के वर्णन के पश्चात् दितीया-हिक में तीन प्रकार की बादादि कथाओं में से प्रथम बाद कथा का बर्णन करना उचित होने से उसका लक्षण सूत्रकार ने ऐसा किया है कि जिस कथा में प्रमाण एवं तर्क से स्वपक्ष की स्थापना तथा परपक्ष के साधक हेतु का खण्डन किया जाता है, एवं स्वीकृत सिद्धान्त का विरोध न होने से जिसमें विरोध नामक हेत्वामासबादी के खण्डनार्थ दिया जाता है, तथा जिसमें प्रतिश्च। आदि चाँच अवयव सो होते हैं जिससे अवयवों में अधिकता तथा न्यूनता रू। निग्रह स्थान भी वादी के खण्डन के लिये दिए जा सकते हैं, ऐसे पक्ष प्रतिपक्ष अर्थात् (एक विषय में विरुद्ध दो धर्मों) का स्वोकार होता है, उसे वाद नामक प्रथम कथा कहते हैं। यद्यपि निर्णय के अनुकूल होने के कारण प्रथम आद्धिक में ही बादकथा का लक्षण करना युक्त या तथापि तीनप्रकार की कथाओं के अन्तर्गत होने से द्वितीयाडिक में ही उसका भी वर्णन सूत्रकार कर रहे हैं। जिसमें अनेक वक्ताओं से युक्त विचार के पदार्थ को विषय करने वाले बाक्यों के सन्दर्भ की कथा कहते हैं, वह तीन ही प्रकार की होती है (ऐसा 'पक्षप्रतिपचपरिग्रहः' इस सूत्र के पद से सूचित होता है।) जिसमें गुरु आदि के साथ बाद कया, एवं जय की इच्छा करने वाले के साथ जल्प, एवं वितण्डानामक दो कया होती है यह विशेषता है) इस सूत्र में 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः' इस पद में 'प्रमाणतर्कसाधना' तथा 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः' ऐसा मध्यम पद लोधीः समास जानना चाहिये। (यथपि वितण्डाकथा में पक्ष तथा प्रतिपक्ष का परिग्रह होता है, तथापि प्रतिपक्ष (विरुद्धपक्ष) की स्थापना नहीं होती, क्योंकि उसमें साधन नहीं होता,


भाष्यकार

एक आश्रय में रहने वाले विरुद्ध धर्मो को परस्पर विरोध होने के कारण पक्ष तथा प्रतिपक्ष कहते हैं, जैसे बारमा है तथा नहीं है ( प्रतिपक्ष है) अनेक आमय में रहने वाले विरुद्धचर्म पक्ष तथा प्रतिपक्ष नहीं होते, जैसे भारमा नित्य है और दुरि अनित्य है (यह पक्ष मतिपक्ष नहीं है सूत्र में परिध शब्द का स्वीकार की व्यवस्था यह अर्थ है। वह यद इस प्रकार का पक्ष तथा प्रतिपक्ष का मानना ही बड नामक प्रयर कया का कक्षण है। उसका 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्मः यह विशेषण है। जिसका प्रमाण तथा तर्क से जिसमें पक्ष की स्थापना होती है एवं प्रमाण तथा तर्क से दूसरे के पक्ष का खण्डन होता है ऐसा अर्थ है क्योंकि इस नाथ कथा में प्रत्यक्षादि प्रमाण और तर्क से भी स्वपक्ष का साधन, पर्व दूसरे विरोधी पक्ष का खण्डन मी किया जाता है, इस कारण सूत्र के 'प्रमाणतर्कसाधनोपाहरुम इस पद में साधनशब्द का अब अपने पक्ष की स्थापना करना भऔर उपाळंम शब्द का अर्थ है विरोषि पक्ष का निवेध (सण्डन)। वे दोनों स्वपक्ष की स्थापना तथा विरोधि पक्ष का साण्जन, दोनों पक्षों में (व्यतिषक्तो जुड़े हुए अनुबद्ध परस्पर में सम्बद्ध तब तक होते हैं, जिस समय तक एक की निवृति और दूसरे की स्थिति नहीं ठीक होती। जिस पक्ष की निवृत्चि होता है उसका उपार्थम (खण्डन) तथा जो पक्ष स्थिर हो जाता है उस पक्ष का साधन (स्थापना) होती है (नागे 'सिद्धान्ताविरुद्धः' इस विशेषण की सार्थकता दिखाते हुए माष्यकार कहते हैं कि)-जल्पकया में आगे निग्रह स्थानों का उपयोग करना (आगे करेंगे जिससे बाद कथा में निग्रह स्थानों के उपयोग का निषेष प्राप्त होता है।


भाषान्तर

Discussion is the adoption of one of two opposing sides. What is adopted is analysed in the form of five members, and defended by the aid of any of the means of right knowledge, while its opposite is assailed by confutation, without deviation from the established tenets.