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	<title>Sbg 8.13 hcrskd - Revision history</title>
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	<updated>2026-05-06T06:00:15Z</updated>
	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
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		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-04T07:01:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas&lt;br /&gt;
।।8.13।।&lt;br /&gt;
व्याख्या--&lt;br /&gt;
&amp;#039;सर्वद्वाराणि संयम्य&amp;#039;--&lt;br /&gt;
(अन्तसमयमें) सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारोंका संयम कर ले अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-- इन पाँचों विषयोंसे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका-- इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा बोलना, ग्रहण करना, गमन करना, मूत्र-त्याग और मल-त्याग -- इन पाँचों क्रियाओंसे वाणी, हाथ, चरण, उपस्थ और गुदा--इन पाँचों कर्मेन्द्रियोंको सर्वथा हटा ले। इससे इन्द्रियाँ अपने स्थानमें रहेंगी।&lt;br /&gt;
&amp;#039;मनो हृदि निरुध्य च&amp;#039; --&lt;br /&gt;
मनका हृदयमें ही निरोध कर ले अर्थात् मनको विषयोंकी तरफ न जाने दे। इससे मन अपने स्थान-(हृदय-) में रहेगा।&lt;br /&gt;
&amp;#039;मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणम्&amp;#039; --&lt;br /&gt;
प्राणोंको मस्तकमें धारण कर ले अर्थात् प्राणोंपर अपना अधिकार प्राप्त करके दसवें द्वार--ब्रह्मरन्ध्रमें प्राणोंको रोक ले।&lt;br /&gt;
&amp;#039;आस्थितो योगधारणाम्&amp;#039;--&lt;br /&gt;
इस प्रकार योगधारणामें स्थित हो जाय। इन्द्रियोंसे कुछ भी चेष्टा न करना, मनसे भी संकल्प-विकल्प न करना और प्राणोंपर पूरा अधिकार प्राप्त करना ही योगधारणामें स्थित होना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्&amp;#039;--&lt;br /&gt;
इसके बाद एक अक्षर ब्रह्म ँ़ (प्रणव) का मानसिक उच्चारण करे और मेरा अर्थात् निर्गुण-निराकार परम अक्षर ब्रह्मका (जिसका वर्णन इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें हुआ है), स्मरण करे&lt;br /&gt;
(टिप्पणी प&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
464)&lt;br /&gt;
। सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही सत्तारूपसे परिपूर्ण हैं--ऐसी धारणा करना ही मेरा स्मरण है।&lt;br /&gt;
&amp;#039;यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्&amp;#039;--&lt;br /&gt;
उपर्युक्त प्रकारसे निर्गुण-निराकारका स्मरण करते हुए जो देहका त्याग करता है अर्थात् दसवें द्वारसे प्राणोंको छोड़ता है वह परमगतिको अर्थात् निर्गुण-निराकार परमात्माको प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्बन्ध--&lt;br /&gt;
जिसके पास योगका बल होता है और जिसका प्राणोंपर अधिकार होता है उसको तो निर्गुण-निराकारकी प्राप्ति हो जाती है; परन्तु दीर्घकालीन अभ्यास-साध्य होनेसे यह बात सबके लिये कठिन पड़ती है। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अपनी अर्थात् सगुण-साकारकी सुगमता-पूर्वक प्राप्तिकी बात कहते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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