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	<title>Sbg 6.15 hcrskd - Revision history</title>
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	<updated>2026-05-02T09:22:52Z</updated>
	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
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		<id>https://iks.bhu.edu.in/index.php?title=Sbg_6.15_hcrskd&amp;diff=9247&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-04T06:26:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas&lt;br /&gt;
।।6.15।।&lt;br /&gt;
व्याख्या--&lt;br /&gt;
&amp;#039;योगी नियतमानसः&amp;#039;&lt;br /&gt;
जिसका मनपर अधिकार है, वह&lt;br /&gt;
&amp;#039;नियतमानसः&amp;#039;&lt;br /&gt;
है। साधक &amp;#039;नियतमानस&amp;#039; तभी हो सकता है, जब उसके उद्देश्यमें केवल परमात्मा ही रहते हैं। परमात्माके सिवाय उसका और किसीसे सम्बन्ध नहीं रहता। कारण कि जबतक उसका सम्बन्ध संसारके साथ बना रहता है, तबतक उसका मन नियत नहीं हो सकता।साधकसे यह एक बड़ी गलती होती है कि वह अपने-आपको गृहस्थ आदि मानता है और साधन ध्यानयोगका करता है। जिससे ध्यानयोगकी सिद्धि जल्दी नहीं होती। अतः साधकको चाहिये कि वह अपने-आपको गृहस्थ, साधु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि किसी वर्ण-आश्रमका न मानकर ऐसा माने कि &amp;#039;मैं तो केवल ध्यान करनेवाला हूँ। ध्यानसे परमात्माकी प्राप्ति करना ही मेरा काम है। सांसारिक ऋद्धि-सिद्धि आदिको प्राप्त करना मेरा उद्देश्य ही नहीं है।&amp;#039; इस प्रकार अहंताका परिवर्तन होनेपर मन स्वाभाविक ही नियत हो जायगा; क्योंकि जहाँ अहंता होती है, वहाँ ही अन्तःकरण और बहिःकरणकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।&lt;br /&gt;
&amp;#039;युञ्जन्नेवं सदात्मानम्&amp;#039;--&lt;br /&gt;
दसवें श्लोकके&lt;br /&gt;
&amp;#039;योगी युञ्जीत सततम्&amp;#039;&lt;br /&gt;
पदोंसे लेकर चौदहवें श्लोकके&lt;br /&gt;
&amp;#039;युक्त आसीत मत्परः&amp;#039;&lt;br /&gt;
पदोंतक जितना ध्यानका, मन लगानेका वर्णन हुआ है, उस सबको यहाँ&lt;br /&gt;
&amp;#039;एवम्&amp;#039;&lt;br /&gt;
पदसे लेना चाहिये।&lt;br /&gt;
&amp;#039;युञ्जन् आत्मानम्&amp;#039;&lt;br /&gt;
का तात्पर्य है कि मनको संसारसे हटाकर परमात्मामें लगाते रहना चाहिये।&lt;br /&gt;
&amp;#039;सदा&amp;#039;&lt;br /&gt;
का तात्पर्य है कि प्रतिदिन नियमितरूपसे ध्यानयोगका अभ्यास करना चाहिये। कभी योगका अभ्यास किया और कभी नहीं किया--ऐसा करनेसे ध्यानयोगकी सिद्धि जल्दी नहीं होती। दूसरा तात्पर्य यह है कि परमात्माकी प्राप्तिका लक्ष्य एकान्तमें अथवा व्यवहारमें निरन्तर बना रहना चाहिये।&lt;br /&gt;
&amp;#039;शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति&amp;#039;--&lt;br /&gt;
भगवान्में जो वास्तविक स्थिति है, जिसको प्राप्त होनेपर कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता, उसको यहाँ निर्वाणपरमा शान्ति&amp;#039; कहा गया है। ध्यानयोगी ऐसी निर्वाणपरमा शान्तिको प्राप्त हो जाता है।एक &amp;#039;निर्विकल्प स्थिति&amp;#039; होती है और एक निर्विकल्प बोध होता है। ध्यानयोगमें पहले निर्विकल्प स्थिति होती है फिर उसके बाद निर्विकल्प बोध होता है। इसी निर्विकल्प बोधको यहाँ निर्वाणपरमा शान्ति नामसे कहा गया है।शान्ति दो तरहकी होती है--शान्ति और परमशान्ति। संसारके त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद) से &amp;#039;शान्ति&amp;#039; होती है और परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर &amp;#039;परमशान्ति&amp;#039; होती है। इसी परमशान्तिको गीतामें &amp;#039;नैष्ठिकी शान्ति&amp;#039; (5। 12), &amp;#039;शश्वच्छान्ति&amp;#039; (9। 31) आदि नामोंसे और यहाँ निर्वाणपरमा शान्ति नामसे कहा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्बन्ध--&lt;br /&gt;
अब आगेके दो श्लोकोंमें ध्यानयोगके लिये उपयोगी नियमोंका क्रमशः व्यतिरेक और अन्वय-रीतिसे वर्णन करते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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