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	<title>Sbg 4.21 scanand - Revision history</title>
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	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
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		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-04T06:10:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri&lt;br /&gt;
।।4.21।।सत्यपि विक्षेपके कर्मणि कूटस्थात्मानुसंधानस्य सिद्धे कैवल्यहेतुत्वे विक्षेपाभावे सुतरां तस्य तद्धेतुत्वसिद्धिरित्यभिप्रेत्याह&lt;br /&gt;
यः पुनरिति।&lt;br /&gt;
पूर्वोक्तविपरीतत्वं लोकसंग्रहादिनिरपेक्षत्वं। तदेव वैपरीत्यं स्फोरयति&lt;br /&gt;
प्रागेवेति।&lt;br /&gt;
ससाधनसर्वकर्मसंन्यासे शरीरस्थितिरपि कथमित्याशङ्क्याह&lt;br /&gt;
शरीरेति।&lt;br /&gt;
तर्हि तथाविधचेष्टानिविष्टचेतस्तया सम्यग्ज्ञानबहिर्मुखस्य कुतो मुक्तिरित्याशङ्क्य यथोपदिष्टचेष्टायामनादरान्नैवमित्याह&lt;br /&gt;
ज्ञाननिष्ठ इति।&lt;br /&gt;
इति दर्शयितुमिमं श्लोकं प्राहेति पूर्ववत्। आशिषः प्रार्थनाभेदास्तृष्णाविशेषाः। आशिषां विदुषो निर्गतत्वे हेतुमाह&lt;br /&gt;
यतेति।&lt;br /&gt;
चित्तवदात्मनः संयमनं कथमित्याशङ्क्याह&lt;br /&gt;
आत्मा बाह्य इति।&lt;br /&gt;
द्वयोः संयमने सत्यर्थसिद्धमर्थमाह&lt;br /&gt;
त्यक्तेति।&lt;br /&gt;
सर्वपरिग्रहपरित्यागे देहस्थितिरपि दुःस्था स्यादित्याशङ्क्याह&lt;br /&gt;
शरीरमिति।&lt;br /&gt;
मात्रशब्देन पौनरुक्त्यादनर्थकं केवलं पदमित्याशङ्क्याह&lt;br /&gt;
तत्रापीति।&lt;br /&gt;
शारीरं केवलमित्यादौ शरीरपदार्थं स्फुटीकर्तुमुभयथा संभावनया विकल्पयति&lt;br /&gt;
शारीरमिति।&lt;br /&gt;
शरीरनिर्वर्त्यं शारीरमित्यस्मिन्पक्षे किं दूषणं शरीरस्थितिमात्रं शारीरमित्यस्मिन्वा पक्षे किं फलमिति पूर्ववादी पृच्छति&lt;br /&gt;
किञ्चात इति।&lt;br /&gt;
शरीरनिर्वर्त्यं शारीरमित्यस्मिन्पक्षे सिद्धान्ती दूषणमाह&lt;br /&gt;
उच्यत&lt;br /&gt;
इति।&lt;br /&gt;
शरीरेण यन्निर्वर्त्यं तत्किं प्रतिषिद्धं विहितं वा प्रथमे विरोधः स्यादित्याह&lt;br /&gt;
यदेति।&lt;br /&gt;
प्रतिषिद्धाचरणेऽपि नानिष्टप्राप्तिरित्युक्ते प्रतिषेधशास्त्रविरोधः स्यादित्यर्थः। द्वितीये विहितकरणे सत्यनिष्टप्राप्त्यभावादप्राप्तप्रतिषेधः स्यादित्याह&lt;br /&gt;
शास्त्रीयं चेति।&lt;br /&gt;
दृष्टप्रयोजनं कारीर्यादिकं कर्म अदृष्टप्रयोजनं स्वर्गसाधनं ज्योतिष्टोमादिकं कर्मेति विभागः। शरीरनिर्वर्त्यं कर्म शारीरमभिमतमिति पक्षे दूषणान्तरमाह&lt;br /&gt;
शारीरमिति।&lt;br /&gt;
वाचा मनसा चाकर्मणोऽनुष्ठाने संन्यासिनो भवत्येव किल्बिषप्राप्तिरित्याशङ्क्याह&lt;br /&gt;
तत्रापीति।&lt;br /&gt;
वाङ्मनोभ्यां विहितानुष्ठाने वा प्रतिषिद्धकरणे वा किल्बिषप्राप्तिः संन्यासिनः स्यादिति विकल्प्याद्ये जपध्यानविधिविरोधः स्यादित्युक्त्वा द्वितीयं दूषयति&lt;br /&gt;
प्रतिषिद्धेति।&lt;br /&gt;
शरीरनिर्वर्त्यं कर्म शारीरमिति पक्षमेवं प्रतिक्षिप्य द्वितीयपक्षे लाभं दर्शयति&lt;br /&gt;
यदा त्विति।&lt;br /&gt;
अन्यदेहस्थितिप्रयोजनात्कर्मणः&lt;br /&gt;
सकाशादिति शेषः। तत्रापि विदुषः स्वदृष्ट्या न प्रवृत्तिरिति सूचयति&lt;br /&gt;
लोकेति।&lt;br /&gt;
विद्वानुक्तया रीत्या वर्तमानो नाप्नोति किल्बिषमित्यत्र विवक्षितमर्थमाह&lt;br /&gt;
एवंभूतस्येति।&lt;br /&gt;
विधिनिषेधगम्यं कर्म देहस्थितिहेतुव्यतिरिक्तमकुर्वत इत्यर्थः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषमित्यस्योक्तेन प्रकारेण परिग्रहे शारीरं केवलमिति विशेषणद्वयं निर्दोषं सिध्यतीति फलितमाह&lt;br /&gt;
एवमिति।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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