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	<title>Sbg 3.4 scanand - Revision history</title>
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	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
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		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-03T12:09:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri&lt;br /&gt;
।।3.4।।किमिति भगवता बुद्धेर्ज्यायस्त्वं ज्यायसी चेदित्यत्रोक्तमुपेक्षितमिति तत्राह&lt;br /&gt;
यदर्जुनेनेति।&lt;br /&gt;
किंच ज्ञाननिष्ठायां संन्यासिनामेवाधिकारो भगवतोऽभिप्रेतोऽन्यथा तदीयविभागवचनविरोधादिति विभागवचनसामर्थ्यसिद्धमर्थमाह&lt;br /&gt;
तस्याश्चेति।&lt;br /&gt;
तर्हि विभागवचनानुरोधादर्जुनस्यापि संन्यासपूर्विकायां ज्ञाननिष्ठायामेवाधिकारो भविष्यति नेत्याह&lt;br /&gt;
मां चेति।&lt;br /&gt;
बुद्धेर्ज्यायस्त्वमुपेत्यापीति चकारार्थः। अर्जुनमालक्ष्यभगवानाहेति संबन्धः। अन्तरेणापि कर्माणि श्रवणादिभिर्ज्ञानावाप्तिर्भविष्यतीति परबुद्धिमनुरुध्य विशिनष्टि&lt;br /&gt;
कर्मेति।&lt;br /&gt;
विभागवचनवशादसमुच्चयश्चेदुभयोरपि ज्ञानकर्मणोः स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुत्वमन्यथा कर्मवज्ज्ञानमपि न स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थं साधयेदित्याशङ्क्य संबन्धान्तरमाह&lt;br /&gt;
अथवेति।&lt;br /&gt;
तर्हि ज्ञाननिष्ठापि कर्मनिष्ठावन्निष्ठात्वाविशेषान्न स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुरिति समुच्चयसिद्धिरित्याशङ्क्याह&lt;br /&gt;
ज्ञाननिष्ठा त्विति।&lt;br /&gt;
नहि रज्जुतत्त्वज्ञानमुत्पन्नं फलसिद्धौ सहकारिसापेक्षमालक्ष्यते। तथेदमपि चोत्पन्नं मोक्षाय नान्यदपेक्षते तदाह&lt;br /&gt;
अन्येति।&lt;br /&gt;
यस्य चैतत्कर्म इति श्रुताविव कर्मशब्दस्य क्रियमाणवस्तुविषयत्वमाशङ्क्य व्याचष्टे&lt;br /&gt;
क्रियाणामिति।&lt;br /&gt;
ताश्च नित्यनैमित्तिकत्वेन विभजते&lt;br /&gt;
यज्ञादीनामिति।&lt;br /&gt;
अस्मिन्नेव जन्मन्यनुष्ठितानां कर्मणां बुद्धिशुद्धिद्वारा ज्ञानकारणत्वे ब्रह्मचारिणां कुतो ज्ञानोत्पत्तिर्जन्मान्तरकृतानां कर्मणां वा तथात्वे गृहस्थादीनामैहिकानि कर्माणि न ज्ञानहेतवः स्युरित्याशङ्क्यानियमं दर्शयति&lt;br /&gt;
इहेति।&lt;br /&gt;
नेमानि सत्त्वशुद्धिकारणान्युपात्तदुरितप्रतिबन्धादित्याशङ्क्याह&lt;br /&gt;
उपात्तेति।&lt;br /&gt;
तर्हि तावतैव कृतार्थानां कुतो ज्ञाननिष्ठाहेतुत्वं तत्राह&lt;br /&gt;
तत्कारणत्वेनेति।&lt;br /&gt;
कर्मणां चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानहेतुत्वे मानमाह&lt;br /&gt;
ज्ञानमिति।&lt;br /&gt;
अनारम्भशब्दस्योपक्रमविपरीतविषयत्वं व्यावर्तयति&lt;br /&gt;
अननुष्ठानादिति।&lt;br /&gt;
निष्कर्मणः संन्यासिनः कर्मज्ञानं नैष्कर्म्यमिति व्याचष्टे&lt;br /&gt;
निष्कर्मेति।&lt;br /&gt;
कर्माभावावस्थां व्यवच्छिनत्ति&lt;br /&gt;
ज्ञानयोगेनेति।&lt;br /&gt;
तस्याः साधनपक्षपातित्वं व्यावर्तयति&lt;br /&gt;
निष्क्रियेति।&lt;br /&gt;
कर्मानुष्ठानोपायलब्धा ज्ञाननिष्ठा स्वतन्त्रा पुमर्थहेतुरिति प्रकृतार्थसमर्थनार्थं व्यतिरेकवचनस्यान्वये पर्यवसानं मत्वा व्याचष्टे&lt;br /&gt;
कर्मणामिति।&lt;br /&gt;
तद्विपर्ययमेव व्याचष्टे&lt;br /&gt;
तेषामिति।&lt;br /&gt;
उक्तेऽर्थे हेतुं पृच्छति&lt;br /&gt;
कस्मादिति।&lt;br /&gt;
जिज्ञासितं हेतुमाह&lt;br /&gt;
उच्यत इति।&lt;br /&gt;
उपायत्वेऽपि तदभावे कुतो नैष्कर्म्यासिद्धिरित्याशङ्क्याह&lt;br /&gt;
नहीति।&lt;br /&gt;
ज्ञानयोगं प्रति कर्मयोगस्योपायत्वे श्रुतिस्मृती प्रमाणयति&lt;br /&gt;
कर्मयोगेति।&lt;br /&gt;
श्रौतमुपायोपेयत्वप्रतिपादनं प्रकटयति&lt;br /&gt;
श्रुताविति।&lt;br /&gt;
यत्तु गीताशास्त्रे कर्मयोगस्य ज्ञानयोगं प्रत्युपायत्वोपपादनं तदिदानीमुदाहरति&lt;br /&gt;
इहापि चेति।&lt;br /&gt;
न कर्मणामित्यादिना पूर्वार्धं व्याख्यायोत्तरार्धं व्याख्यातुमाशङ्कयति&lt;br /&gt;
नन्विति।&lt;br /&gt;
आदिशब्देनशान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुःसंन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः इत्यादि गृह्यते। तत्रैव लोकप्रसिद्धिमनुकूलयति&lt;br /&gt;
लोके चेति।&lt;br /&gt;
प्रसिद्धतरंयतो यतो निवर्तते ततस्ततो विमुच्यते। निवर्तनाद्धि सर्वतो न वेत्ति दुःखमण्वपि इत्यादिदर्शनादिति शेषः। लौकिकवैदिकप्रसिद्धिभ्यां सिद्धमर्थमाह&lt;br /&gt;
अतश्चेति।&lt;br /&gt;
तत्रोत्तरत्वेनोत्तरार्धमवतार्य व्याकरोति&lt;br /&gt;
अत&lt;br /&gt;
आहेत्यादिना।&lt;br /&gt;
एवकारार्थमाह&lt;br /&gt;
केवलादिति।&lt;br /&gt;
तदेव स्पष्टयति&lt;br /&gt;
कर्मेति।&lt;br /&gt;
उक्तमेव नञ्मनुकृष्य क्रियापदेन संगतिं दर्शयति&lt;br /&gt;
न प्राप्नोतीति।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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