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	<title>Sbg 2.16 hcrskd - Revision history</title>
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	<updated>2026-05-17T12:47:43Z</updated>
	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
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		<id>https://iks.bhu.edu.in/index.php?title=Sbg_2.16_hcrskd&amp;diff=4067&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-03T11:53:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas&lt;br /&gt;
2.16।।&lt;br /&gt;
व्याख्या --&lt;br /&gt;
&amp;#039;नासतो विद्यते भावः&amp;#039;--&lt;br /&gt;
शरीर उत्पत्तिके पहले भी नहीं था मरनेके बाद भी नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी इसका क्षणप्रतिक्षण अभाव हो रहा है। तात्पर्य है कि यह शरीर भूत भविष्य और वर्तमान इन तीनों कालोंमें कभी भावरूपसे नहीं रहता। अतः यह असत् है। इसी तरहसे इस संसारका भी भाव नहीं है यह भी असत् है। यह शरीर तो संसारका एक छोटासानमूना है इसलिये शरीरके परिवर्तनसे संसारमात्रके परिवर्तनका अनुभव होता है कि इस संसारका पहले भी अभाव था और पीछे भी अभाव होगा तथा वर्तमानमें भी अभाव हो रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसारमात्र कालरूपी अग्निमें लकड़ीकी तरह निरन्तर जल रहा है। लकड़ीके जलनेपर तो कोयला और राख बची रहती है पर संसारको कालरूपी अग्नि ऐसी विलक्षण रीतिसे जलाती है कि कोयला अथवा राख कुछ भी बाकी नहीं रहता। वह संसारका अभावहीअभाव कर देती है। इसलिये कहा गया है कि असत्की सत्ता नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;नाभावो विद्यते सतः&amp;#039;--&lt;br /&gt;
जो सत् वस्तु है उसका अभाव नहीं होता अर्थात् जब देह उत्पन्न नहीं हुआ था तब भी देही था देह नष्ट होनेपर भी देही रहेगा और वर्तमानमें देहके परिवर्तनशील होनेपर भी देही उसमें ज्योंकात्यों ही रहता है। इसी रीतिसे जब संसार उत्पन्न नहीं हुआ था उस समय भी परमात्मतत्त्व था संसारका अभाव होनेपर भी परमात्मतत्त्व रहेगा और वर्तमानमें संसारके परिवर्तनशील होनेपर भी परमात्मतत्त्व उसमें ज्योंकात्यों ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्मिक बात&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसारको हम एक ही बार देख सकते हैं दूसरी बार नहीं। कारण कि संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है अतः एक क्षण पहले वस्तु जैसी थी दूसरे क्षणमें वह वैसी नहीं रहती जैसे सिनेमा देखते समय परदेपर दृश्य स्थिर दीखता है पर वास्तवमें उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। मशीनपर फिल्म तेजीसे घूमनेके कारण वह परिवर्तन इतनी तेजीसे होता है कि उसे हमारी आँखें नहीं पकड़ पातीं&lt;br /&gt;
(टिप्पणी प&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
56.1)&lt;br /&gt;
। इससे भी अधिक मार्मिक बात यह है कि वास्तवमें संसार एक बार भी नहीं दीखता। कारण कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि जिन करणोंसे हम संसारको देखते हैं अनुभव करते हैं वे करण भी संसारके ही हैं। अतः वास्तवमें संसारसे ही संसार दीखता है। जो शरीरसंसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित है उस स्वरूपसे संसार कभी दीखता ही नहीं तात्पर्य यह है कि स्वरूपमें संसारकी प्रतीति नहीं है। संसारके सम्बन्धसे ही संसारकी प्रतीति होती है। इससे सिद्ध हुआ कि स्वरूपका संसारसे कोई सम्बन्ध है ही नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी बात संसार (शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि) की सहायताके बिना चेतनस्वरूप कुछ कर ही नहीं सकता। इससे सिद्ध हुआ कि मात्र क्रिया संसारमें ही है स्वरूपमें नहीं। स्वरूपका क्रियासे कोई सम्बन्ध है ही नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसारका स्वरूप है क्रिया और पदार्थ। जब स्वरूपका न तो क्रियासे और न पदार्थसे ही कोई सम्बन्ध है तब यह सिद्ध हो गया कि शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिसहित सम्पूर्ण संसारका अभाव है। केवल परमात्मतत्त्वका ही भाव (सत्ता) है जो निर्लिप्तरूपसे सबका प्रकाशक और आधार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः&amp;#039;--&lt;br /&gt;
इन दोनोंके अर्थात् सत्असत् देहीदेहके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंने इनका तत्त्व देखा है इनका निचोड़ निकाला है कि केवल एक सत्तत्त्व ही विद्यमान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असत् वस्तुका तत्त्व भी सत् है और सत् वस्तुका तत्त्व भी सत् है अर्थात् दोनोंका तत्त्व एक सत् ही है दोनोंका तत्त्व भावरूपसे एक ही है। अतः सत् और असत् इन दोनोंके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जाननेमें आनेवाला एक सत्तत्त्व ही है। असत्की जो सत्ता प्रतीत होती है वह सत्ता भी वास्तवमें सत्की ही है। सत्की सत्तासे ही असत् सत्तावान् प्रतीत होता है। इसी सत्को&lt;br /&gt;
&amp;#039;परा प्रकृति&amp;#039;&lt;br /&gt;
(गीता 7। 5)&lt;br /&gt;
&amp;#039;क्षेत्रज्ञ&amp;#039;&lt;br /&gt;
(गीता 13। 12)&lt;br /&gt;
&amp;#039;पुरुष&amp;#039;&lt;br /&gt;
(गीता 13। 19) और&lt;br /&gt;
&amp;#039;अक्ष&amp;#039;&lt;br /&gt;
(गीता 15। 16) कहा गया है तथा असत्को&lt;br /&gt;
&amp;#039;अपरा प्रकृति क्षेत्र प्रकृति&amp;#039;&lt;br /&gt;
और&lt;br /&gt;
&amp;#039;क्षर&amp;#039;&lt;br /&gt;
कहा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्जुन भी शरीरोंको लेकर शोक कर रहे हैं कि युद्ध करनेसे ये सब मर जायँगे। इसपर भगवान् कहते हैं कि क्या युद्ध न करनेसे ये नहीं मरेंगे असत् तो मरेगा ही और निरन्तर मर ही रहा है। परन्तु इसमें जो सत्रूपसे है उसका कभी अभाव नहीं होगा। इसलिये शोक करना तुम्हारी बेसमझी ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्यारहवें श्लोकमें आया है कि जो मर गये हैं और जो जी रहे हैं उन दोनोंके लिये पण्डितजन शोक नहीं करते। बारहवेंतेरहवें श्लोकोंमें देहीकी नित्यताका वर्णन है उसमें&lt;br /&gt;
&amp;#039;धीर&amp;#039;&lt;br /&gt;
शब्द आया है। चौदहवेंपंद्रहवें श्लोकोंमें संसारकी अनित्यताका वर्णन आया है तो उसमें भी&lt;br /&gt;
&amp;#039;धीर&amp;#039;&lt;br /&gt;
शब्द आया है। ऐसे ही यहाँ (सोलहवें श्लोकमें) सत्असत्का विवेचन आया है तो इसमें&lt;br /&gt;
&amp;#039;तत्त्वदर्शी&amp;#039;&lt;br /&gt;
(टिप्पणी प&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
56.2)&lt;br /&gt;
शब्द आया है। इन श्लोकोंमें&lt;br /&gt;
&amp;#039;पण्डित धीर&amp;#039;&lt;br /&gt;
और&lt;br /&gt;
&amp;#039;तत्त्वदर्शी&amp;#039;&lt;br /&gt;
पद देनेका तात्पर्य है कि जो विवेकी होते हैं समझदार होते हैं उनको शोक नहीं होता। अगर शोक होता है तो वे विवेकी नहीं हैं समझदार नहीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्बन्ध--&lt;br /&gt;
सत् और असत् क्या है इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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