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	<title>Sbg 18.14 hcrskd - Revision history</title>
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	<updated>2026-04-09T00:30:30Z</updated>
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		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-04T10:07:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas&lt;br /&gt;
।।18.14।।&lt;br /&gt;
व्याख्या --&lt;br /&gt;
अधिष्ठानम् --&lt;br /&gt;
शरीर और जिस देशमें यह शरीर स्थित है? वह देश -- ये दोनों अधिष्ठान हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्ता --&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्योंके द्वारा ही होती हैं। वे क्रियाएँ चाहे समष्टि हों? चाहे व्यष्टि हों परन्तु उन क्रियाओँका कर्ता स्वयं नहीं है। केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसको चेतन और जडका ज्ञान नहीं है -- ऐसा अविवेककी पुरुष ही जब प्रकृतिसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मान लेता है? तब वह कर्ता बन जाता है&lt;br /&gt;
(टिप्पणी प&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
896)&lt;br /&gt;
। ऐसा कर्ता ही कर्मोंकी सिद्धिमें हेतु बनता है।&lt;br /&gt;
करणं च पृथग्विधम् --&lt;br /&gt;
कुल तेरह करण हैं। पाणि? पाद? वाक्? उपस्थ और पायु -- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र? चक्षु? त्वक्? रसना और घ्राण -- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ -- ये दस बहिःकरण हैं तथा मन? बुद्धि और अहंकार -- ये तीन अन्तःकरण हैं।&lt;br /&gt;
विविधाश्च पृथक्चेष्टाः --&lt;br /&gt;
उपर्युक्त तेरह करणोंकी अलगअलग चेष्टाएँ होती हैं जैसे --&lt;br /&gt;
पाणि&lt;br /&gt;
(हाथ) -- आदानप्रदान करना?&lt;br /&gt;
पाद&lt;br /&gt;
(पैर) -- आनाजाना? चलनाफिरना?&lt;br /&gt;
वाक् --&lt;br /&gt;
बोलना?&lt;br /&gt;
उपस्थ --&lt;br /&gt;
मूत्रका त्याग करना?&lt;br /&gt;
पायु&lt;br /&gt;
(गुदा) -- मलका त्याग करना?&lt;br /&gt;
श्रोत्र --&lt;br /&gt;
सुनना?&lt;br /&gt;
चक्षु --&lt;br /&gt;
देखना?&lt;br /&gt;
त्वक् --&lt;br /&gt;
स्पर्श करना?&lt;br /&gt;
रसना --&lt;br /&gt;
चखना?&lt;br /&gt;
घ्राण  --&lt;br /&gt;
सूँघना?&lt;br /&gt;
मन  --&lt;br /&gt;
मनन करना?&lt;br /&gt;
बुद्धि  --&lt;br /&gt;
निश्चय करना और&lt;br /&gt;
अहंकार --&lt;br /&gt;
मैं ऐसा हूँआदि अभिमान करना।&lt;br /&gt;
दैवं चैवात्र पञ्चमम् --&lt;br /&gt;
कर्मोंकी सिद्धिमें पाँचवें हेतुका नाम दैव है। यहाँ दैव नाम संस्कारोंका है। मनुष्य जैसा कर्म करता है? वैसा ही संस्कार उसके अन्तःकरणपर पड़ता है। शुभकर्मका शुभ संस्कार पड़ता है और अशुभकर्मका अशुभ संस्कार पड़ता है। वे ही संस्कार आगे कर्म करनेकी स्फुरणा पैदा करते हैं। जिसमें जिस कर्मका संस्कार जितना अधिक होता है? उस कर्ममें वह उतनी ही सुगमतासे लग सकता है और जिस कर्मका विशेष संस्कार नहीं है? उसको करनेमें उसे कुछ परिश्रम पड़ सकता है। इसी प्रकार मनुष्य सुनता है? पुस्तकें पढ़ता है और विचार भी करता है तो वे भी अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यके अन्तःकरणमें शुभ और अशुभ -- जैसे संस्कार होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म करनेकी स्फुरणा होती है।इस श्लोकमें कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताये गये हैं -- अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव। इसका कारण यह है कि आधारके बिना कोई भी काम कहाँ किया जायगा इसलिये&lt;br /&gt;
अधिष्ठान&lt;br /&gt;
पद आया है। कर्ताके बिना क्रिया कौन करेगा इसलिये&lt;br /&gt;
कर्ता&lt;br /&gt;
पद आया है। क्रिया करनेके साधन (करण) होनेसे ही तो कर्ता क्रिया करेगा? इसलिये&lt;br /&gt;
करण&lt;br /&gt;
पद आया है। करनेके साधन होनेपर भी क्रिया नहीं की जायगी तो कर्मसिद्धि कैसे होगी इसलिये&lt;br /&gt;
चेष्टा&lt;br /&gt;
पद आया है। कर्ता अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही क्रिया करेगा? संस्कारोंके विरुद्ध अथवा संस्कारोंके बिना क्रिया नहीं कर सकेगा? इसलिये&lt;br /&gt;
दैव&lt;br /&gt;
पद आया है। इस प्रकार इन पाँचोंके होनेसे ही कर्मसिद्धि होती है।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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