<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="en">
	<id>https://iks.bhu.edu.in/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=Sbg_17.13_hcrskd</id>
	<title>Sbg 17.13 hcrskd - Revision history</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://iks.bhu.edu.in/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=Sbg_17.13_hcrskd"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://iks.bhu.edu.in/index.php?title=Sbg_17.13_hcrskd&amp;action=history"/>
	<updated>2026-04-07T10:08:39Z</updated>
	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.44.3</generator>
	<entry>
		<id>https://iks.bhu.edu.in/index.php?title=Sbg_17.13_hcrskd&amp;diff=19327&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://iks.bhu.edu.in/index.php?title=Sbg_17.13_hcrskd&amp;diff=19327&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2025-12-04T10:00:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas&lt;br /&gt;
।।17.13।।&lt;br /&gt;
व्याख्या --&lt;br /&gt;
विधिहीनम् --&lt;br /&gt;
अलगअलग यज्ञोंकी अलगअलग विधियाँ होती हैं और उसके अनुसार यज्ञकुण्ड? स्रुवा आदि पात्र? बैठनेकी दिशा? आसन आदिका विचार होता है। अलगअलग देवताओंकी अलगअलग सामग्री होती है जैसे -- देवीके यज्ञमें लाल वस्त्र और लाल सामग्री होती है। परन्तु तामस यज्ञमें इन विधियोंका पालन नहीं होता? प्रत्युत उपेक्षापूर्वक विधिका त्याग होता है।&lt;br /&gt;
असृष्टान्नम् --&lt;br /&gt;
तामस मनुष्य जो द्रव्ययज्ञ करते हैं? उसमें ब्राह्मणादिको अन्नदान नहीं किया जाता। तामस मनुष्योंका यह भाव रहता है कि मुफ्तमें रोटी मिलनेसे वे आलसी हो जायेंगे? कामधंधा नहीं करेंगे।&lt;br /&gt;
मन्त्रहीनम् --&lt;br /&gt;
वेदोंमें और वेदानुकूल शास्त्रोंमें कहे हुए मन्त्रोंसे ही द्रव्ययज्ञ किया जाता है। परन्तु तामस यज्ञमें वैदिक तथा शास्त्रीय मन्त्रोंसे यज्ञ नहीं किया जाता। कारण कि तामस पुरुषोंका यह भाव रहता है कि आहुति देनेमात्रसे यज्ञ हो जाता है? सुगन्ध हो जाती है? गंदे परमाणु नष्ट हो जाते हैं? फिर मन्त्रोंकी क्या जरूरत है आदि।&lt;br /&gt;
अदक्षिणम् --&lt;br /&gt;
तामस यज्ञमें दान नहीं किया जाता। कारण कि तामस पुरुषोंका यह भाव रहता है कि हमने यज्ञमें आहुति दे दी और ब्राह्मणोंको अच्छी तरहसे भोजन करा दिया? अब उनको दक्षिणा देनेकी क्या जरूरत रही यदि हम उनको दक्षिणा देंगे तो वे आलसीप्रमादी हो जायँगे? पुरुषार्थहीन हो जायँगे? जिससे दुनियामें बेकारी फैलेगी दूसरी बात? जिन ब्राह्मणोंको दक्षिणा मिलती है? वे कुछ कमाते ही नहीं? इसलिये वे पृथ्वीपर भाररूप रहते हैं? इत्यादि। वे तामस मनुष्य यह नहीं सोचते कि ब्राह्मणादिको अन्नदान? दक्षिणा आदि न देनेसे वे तो प्रमादी बनें? चाहे न बनें पर शास्त्रविधिका? अपने कर्तव्यकर्मका त्याग करनेसे हम तो प्रमादी बन ही गये&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते --&lt;br /&gt;
अग्निमें आहुति देनेके विषयमें तामस मनुष्योंका यह भाव रहता है कि अन्न? घी? जौ? चावल? नारियल? छुहारा आदि तो मनुष्यके निर्वाहके कामकी चीजें हैं। ऐसी चीजोंको अग्निमें फूँक देना कितनी मूर्खता है&lt;br /&gt;
(टिप्पणी प&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
849.1)&lt;br /&gt;
अपनी प्रसिद्धि? मानबड़ाईके लिये वे यज्ञ करते भी हैं तो बिना शास्त्रविधिके? बिना अन्नदानके? बिना मन्त्रोंके और बिना दक्षिणाके करते हैं। उनकी शास्त्रोंपर? शास्त्रोक्त मन्त्रोंपर और उनमें बतायी हुई विधियोंपर तथा शास्त्रोक्त विधिपूर्वक की गयी यज्ञकी क्रियापर और उसके पारलौकिक फलपर भी श्रद्धाविश्वास नहीं होते। कारण कि उनमें मूढ़ता होती है। उनमें अपनी तो अक्ल होती नहीं और दूसरा कोई समझा दे तो उसे मानते नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस तामस यज्ञमें&lt;br /&gt;
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः&lt;br /&gt;
(गीता 16। 23) और&lt;br /&gt;
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्&lt;br /&gt;
(गीता 17। 28) -- ये दोनों भाव होते हैं। अतः वे इहलोक और परलोकका जो फल चाहते हैं? वह उनको नहीं मिलता --&lt;br /&gt;
न सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्? न च तत्प्रेत्य नो इह।&lt;br /&gt;
तात्पर्य है कि उनको उपेक्षापूर्वक किये गये शुभकर्मोंका इच्छित फल तो नहीं मिलेगा? पर अशुभकर्मोंका फल (अधोगति) तो मिलेगा ही --&lt;br /&gt;
अधो गच्छन्ति तामसाः&lt;br /&gt;
(14। 18)। कारण कि अशुभ फलमें अश्रद्धा ही हेतु है और वे अश्रद्धापूर्वक ही शास्त्रविरुद्ध आचरण करते हैं अतः इसका दण्ड तो उनको मिलेगा ही।इन यज्ञोंमें कर्ता? ज्ञान? क्रिया? धृति? बुद्धि? सङ्ग? शास्त्र? खानपान आदि यदि सात्त्विक होंगे? तो वह यज्ञ सात्त्विक हो जायगा यदि राजस होंगे? तो वह यज्ञ राजस हो जायगा और यदि तामस होंगे? तो वह यज्ञ,तामस हो जायगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्बन्ध --&lt;br /&gt;
ग्यारहवें? बारहवें और तेरहवें श्लोकमें क्रमशः सात्त्विक? राजस और तामस यज्ञका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः शारीरिक? वाचिक और मानसिक तपका वर्णन करते हैं (जिसका सात्त्विक? राजस और तामसभेद आगे करेंगे)।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
	</entry>
</feed>