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	<title>Sbg 13.23 hcchi - Revision history</title>
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	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
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		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-04T08:25:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Hindi Commentary By Swami Chinmayananda&lt;br /&gt;
।।13.23।। इस भ्रमित दुखी क्षेत्रज्ञ पुरुष से भिन्न? क्षेत्रोपाधि से असंस्पृष्ट शुद्ध परम पुरुष है। प्रत्येक प्रतिबिम्ब के अस्तित्व के लिये एक बिम्बभूत सत्य वस्तु की आवश्यकता होती है। प्रतिबिम्ब की स्थिति दर्पण या जल आदि की सतह पर निर्भर करती है? किन्तु बिम्बभूत सत्यवस्तु को उस सतह का स्पर्श तक नहीं होता। जैसे? चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब पात्र के जल पर निर्भर करता है? किन्तु चन्द्रमा अपने प्रकाशस्वरूप में ही स्थित रहता है।चित्स्वरूप आत्मा क्षेत्र की उपाधि से क्षेत्रज्ञ बनता है। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा अपने स्वरूप से निरुपाधिक अर्थात् सर्व उपाधिरहित है।,इस श्लोक में? वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन और विश्लेषण करने की दृष्टि से? भगवान् श्रीकृष्ण उक्त दो प्रकार के पुरुषों  सोपाधिक और निरुपाधिक का निर्देश करते हैं। यहाँ इस बात का स्मरण रहे कि वस्तुत पुरुष एक ही है।यहाँ विभिन्न नामों के द्वारा एक ही परमात्मा को इंगित किया गया है। ये विभिन्न नाम जीव की मनस्थिति अर्थात् अज्ञान आवरण की सघनता और विरलता की दृष्टि से दिये गये हैं। आत्मस्वरूप के विषय में पूर्ण अज्ञानी तथा रागद्वेषादि वृत्तियों से पूर्ण मन वाले व्यक्ति में आत्मा मानो केवल उपद्रष्टा बनकर रहता है अर्थात इस पुरुष के अपराधपूर्ण कार्यों को भी साक्षीभाव से प्रकाशित मात्र करता है वैसे भी आत्मा सममस्त प्राणियों की वृत्तियों का उपद्रष्टा मात्र है। परन्तु जब उस व्यक्ति का चित्त कुछ मात्रा में शुद्ध होता है और वह सत्कर्म में प्रवृत्त हौता है? तब परमात्मा मानो अनुमन्ता बनता है? अर्थात् उसके सत्कर्मों को अपनी अनुमति प्रदान करता है।अन्तकरण के और अधिक शुद्ध होने पर वह व्यक्ति जब अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जागरूक हो जाता है तब ईश्वर उसके कर्मों को पूर्ण करने वाला भर्ता बन जाता है। अर्पण की भावना से किये गये कर्मों में ईश्वर की कृपा से सफलता ही प्राप्त होती है। ऐसा प्रतीत होता है? मानो? ईश्वर उस साधक के अल्प प्रयत्नों को भी पूर्णता प्रदान करता है।जब वह साधक अपने अहंकार को भुलाकर पूर्णतया योगयुक्त हो जाता है? तब ऐसे व्यक्ति के हृदय में आत्मा ही भोक्ता बनी प्रतीत होती है। इस श्लोक की समाप्ति इस कथन के साथ होती है कि आत्मा ही महेश्वर है। वही इस देह में परम पुरुष है।प्रकृति और पुरुष के तत्त्व को जानने वाले साधक के विषय में कहते हैं कि&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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