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	<title>Sbg 13.15 htshg - Revision history</title>
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	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
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		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-04T08:23:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Hindi Translation Of Sri Shankaracharya&amp;#039;s Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka&lt;br /&gt;
।।13.15।।उपाधिरूप हाथ? पैर आदि इन्द्रियोंके अध्यारोपसे किसीको ऐसी शङ्का न हो कि ज्ञेय उन उपाधियोंवाला है? इस अभिप्रायसे यह श्लोक कहते हैं --, वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंके गुणोंसे अवभासित ( प्रतीत ) होनेवाला है। यहाँ श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ? वाक् आदि कर्मेन्द्रियाँ तथा मन और बुद्धि ये दोनों अन्तःकरण -- इन सबका सर्व इन्द्रियोंके नामसे ग्रहण है क्योंकि अन्तःकरण भी ज्ञेयकी उपाधिके रूपमें अन्य इन्द्रियोंके समान ही है? बल्कि श्रोत्रादिका भी उपाधित्व अन्तःकरणरूप उपाधिके द्वारा ही है। इसलिये यह अभिप्राय है कि उपाधिरूप अन्तःकरण और बाह्यकरण? इन सभी इन्द्रियोंके गुण जो निश्चय? संकल्प? श्रवण और भाषण आदि हैं? उनके द्वारा वह ज्ञेय प्रतिभासित होता है अर्थात् उन इन्द्रियोंकी क्रियासे वह क्रियावान्सा दिखलायी देता है। ध्यान करता हुआसा? चेष्टा करता हुआसा इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। तो फिर उस ज्ञेयको स्वयं क्रिया करनेवाला ही क्यों नहीं मान लिया जाता इसपर कहते हैं --  वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंसे रहित है अर्थात् सब करणोंसे रहित है। इसलिये वह इन्द्रियोंके व्यापारसे ( वास्तवमें ) व्यापारवाला नहीं होता। यह जो मन्त्र है कि वह ( ईश्वर ) बिना पैर और हाथके चलता और ग्रहण करता है? बिना चक्षुके देखता और बिना कानोंके सुनता है  सो इस अभिप्रायको दिखानेके लिये है कि वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियरूप उपाधियोंके गुणोंकी अनुरूपता प्राप्त करनेमें समर्थ है? उसे साक्षात् गमनादि क्रियाओँसे युक्त बतलानेके लिये यह मन्त्र नहीं है। अन्धेने मणि प्राप्त की इत्यादि मन्त्रोंके अर्थकी भाँति उस मन्त्रका अर्थ है  वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंसे रहित है? इसलिये संगरहित है अर्थात् सब प्रकारके सम्बन्धोंसे रहित है। यद्यपि यह बात है तो भी वह ज्ञेय सबको धारण करनेवाला है। सत्बुद्धि सर्वत्र व्याप्त है? अतः सत् ही,सबका अधिष्ठान है। मृगतृष्णिकादि मिथ्या पदार्थ भी बिना अधिष्ठानके नहीं होते? इसलिये वह ज्ञेय सबका धारण करनेवाला है। उस ज्ञेयकी सत्ताको बतलानेवाला यह दूसरा साधन भी है। वह ज्ञेय निर्गुण यानी सत्त्व? रज और तम इन तीनों गुणोंसे अतीत है तो भी गुणोंका भोक्ता है अर्थात् वह ज्ञेय सुखदुःख और मोहके रूपमें परिणत हुए तीनों गुणोंका शब्दादिद्वारा भोग करनेवाला -- उन्हें उपलब्ध करनेवाला है।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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