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	<title>Sbg 10.33 hcrskd - Revision history</title>
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	<updated>2026-04-08T17:18:46Z</updated>
	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
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		<title>imported&gt;Vij: Added {content_identifier} content</title>
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		<updated>2025-12-04T07:47:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added {content_identifier} content&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas&lt;br /&gt;
।।10.33।।&lt;br /&gt;
व्याख्या--&lt;br /&gt;
&amp;#039;अक्षराणामकारोऽस्मि&amp;#039;--&lt;br /&gt;
वर्णमालामें सर्वप्रथम अकार आता है। स्वर और व्यञ्जन--दोनोंमें अकार मुख्य है। अकारके बिना व्यञ्जनोंका उच्चारण नहीं होता। इसलिये अकारको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।&lt;br /&gt;
&amp;#039;द्वन्द्वः सामासिकस्य च&amp;#039;--&lt;br /&gt;
जिससे दो या दोसे अधिक शब्दोंको मिलाकर एक शब्द बनता है, उसको समसा कहते हैं। समास कई तरहके होते हैं। उनमें अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुब्रीहि और द्वन्द्व -- ये चार मुख्य हैं। दो शब्दोंके समासमें यदि पहला शब्द प्रधानता रखता है तो वह &amp;#039;अव्ययीभाव समास&amp;#039; होता है। यदि आगेका शब्द प्रधानता रखता है तो वह &amp;#039;तत्पुरुष समास&amp;#039; होता है। यदि दोनों शब्द अन्यके वाचक होते हैं तो वह &amp;#039;बहुब्रीहि समास&amp;#039; होता है। यदि दोनों शब्द प्रधानता रखते हैं तो वह द्वन्द्व समास होता है।द्वन्द्व समासमें दोनों शब्दोंका अर्थ मुख्य होनेसे भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।&lt;br /&gt;
&amp;#039;अहमेवाक्षयः कालः&amp;#039;--&lt;br /&gt;
जिस कालका कभी क्षय नहीं होता अर्थात् जो कालातीत है और अनाद-अनन्तरूप है, वह काल भगवान् ही हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्ग और प्रलयकी गणना तो सूर्यसे होती है, पर महाप्रलयमें जब सूर्य भी लीन हो जाता है, तब समयकी गणना परमात्मासे ही होती है&lt;br /&gt;
(टिप्पणी प&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
563)&lt;br /&gt;
। इसलिये परमात्मा अक्षय काल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसवें श्लोकके&lt;br /&gt;
&amp;#039;कालः कलयतामहम्&amp;#039;&lt;br /&gt;
पदोंमें आये कालमें और यहाँ आये &amp;#039;अक्षय काल&amp;#039;में क्या अन्तर है? वहाँका जो &amp;#039;काल&amp;#039; है, वह एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता, बदलता रहता है। वह काल ज्योतिषशास्त्रका आधार है और उसीसे संसारमात्रके समयकी गणना होती है। परन्तु यहाँका जो &amp;#039;अक्षय काल&amp;#039; है, वह परमात्मस्वरूप होनेसे कभी बदलता नहीं। वह अक्षय काल सबको खा जाता है और स्वयं ज्यों-का-त्यों ही रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई विकार नहीं होता। उसी अक्षय कालको यहाँ भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। आगे ग्यारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने&lt;br /&gt;
&amp;#039;कालोऽस्मि&amp;#039;&lt;br /&gt;
(11। 32) पदसे अक्षय कालको अपना स्वरूप बताया है।&lt;br /&gt;
&amp;#039;धाताहं विश्वतोमुखः&amp;#039;--&lt;br /&gt;
सब ओर मुखवाले होनेसे भगवान्की दृष्टि सभी प्राणियोंपर रहती है। अतः सबका धारणपोषण करनेमें भगवान् बहुत सावधान रहते हैं। किस प्राणीको कौन-सी वस्तु कब मिलनी चाहिये, इसका भगवान् खूब खयाल रखते हैं और समयपर उस वस्तुको पहुँचा देते हैं। इसलिये भगवान्ने अपना विभूतिरूपसे वर्णन किया है।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Vij</name></author>
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